विक्रमादित्य सिंह हिमाचल प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री हैं। उनके पिता स्वर्गीय वीरभद्र सिंह 6 बार इस प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। प्रदेश की हालत पतली थी तो उन्होंने भी अपने काल में प्रदेश के लिए ऋण लिए। ऋण सारी सरकारें ले रहीं हैं तो अब बचता है हिमाचल के पास बाबा जी का ठुल्लू। विक्रमादित्य का भी ऋण को लेकर दर्द छलका है। उन्होंने फरमाया की 75000 करोड़ रुपए का ऋण प्रदेश की मिला है विरासत में। काम तभी होंगे जब टेंडर होंगे। बिना पैसे के टेंडर ज्यादा हो भी की सकते हैं। उनका कहना है की जेब खाली हो तो काम कैसे होंगे। सच में उनके पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं कि घुमाएं और काम होना शुरू हो जाए। अब तो बरसात ने भी इतने अधिक पुल और सड़कें क्षति कर दी हैं कि उन्हें पटरी पर लाने के लिए ही कम से कम 500
की चाहिए।लोग तो सवाल उठाएंगे ही कि जब जेब खाली थी तो क्या जरूरत थी चुनाव पूर्व ओपीएस बहाल करने का वायदा करने की। क्या जरूरत थी
महिलाओं को 1500 रुपए हर माह देने के वायदा करने की। बड़े बड़े वायदे किए हैं तो रास्ता भी खुद निकालो। वरना जनता है सब जानती है।








