एक टुकड़ा कागज (कहानी का हिंदी प्रारूप) (रणजोध सिंह)
स्नेहा ने जैसे ही घर में प्रवेश किया, बुआ को सामने देखकर उसका माथा ठनका| उसे यह अनुमान लगाते देर न लगी कि बुआ आज फिर किसी नये दूल्हे को लेकर आई है|
वह किसी से मिले बिना सीधे अपने कमरे में चली गयी| बुआ सचमुच ही विवाह प्रस्ताव लेकर आई थी| लडके के माता-पिता तथा स्वयं लड़का भी साथ आया था| लड़का चार्टेड-अकाउंटेंट था| लम्बा कद, गौर वर्ण, उस पर माता-पिता की एकलौती संतान|
स्नेहा के माता-पिता को भी लड़का अच्छा लगा था| बुआ की इच्छा थी कि लड़का-लड़की एक –दूसरे को देख लें मगर स्नेहा ने बाहर आने से साफ़ इनकार कर दिया| बुआ को बहुत बुरा लगा, वह एक झटके से उठी और तेज़ी से स्नेहा के कमरे में प्रवेश कर गयी|
“चार अक्षर पढ़कर तुम्हारा दिमाग इतना खराब हो जायेगा, ऐसा नहीं सोचा था| आज तक कोई बाप अपनी बेटी को अपने पल्लू में बांधकर नहीं रख पाया है| आज लोग खुद चल कर तुम्हारे पास आ रहे हैं, कल जब उम्र रेत की तरह हाथ से फिसल जायेगी तो देख लेना सिवा पछतावे के कुछ और हाथ नहीं लगेगा|”
बुआ सब कुछ एक ही साँस में कह गयी| स्नेहा की चुपी देखकर वह जैसे पैर पटकते हुये कक्ष में प्रवेश हुई थी वैसे ही बाहर निकल गयी| स्नेहा हंसमुख स्वभाव की उन्मुक्त कली की भांति थी जिसे हर कोई अपने घर की शोभा बनाना चाहता था| अभी उसकी स्नातक की पढाई भी पूर्ण नहीं हुई थी कि दूर-दूर से उसके विवाह-प्रस्ताव आने लगे थे| उसने अपने माता-पिता को साफ़-साफ़ शब्दों में कह दिया था कि वह अभी पढना चाहती है, अतः वे उसके हाथ पीले-नीले करने की बात न सोचें|
आरंभ में तो उन्होंने उसकी बात स्वीकार कर ली परन्तु जब बार-बार विवाह – प्रस्ताव आने लगे तो उन्हें चिंता हुई, कि कहीं वे गलत तो नहीं कर रहे….. कहीं बेटी की ज़िद की खातिर उसका भविष्य तो नहीं बिगाड़ रहे?’ हमारा समाज बने-बनाये ढर्रे पर चलने का आदी है| जब कोई व्यक्ति लीक से हटकर चलने का प्रयत्न करता है तो यह समाज उसका जमकर विरोध करता है| इस विरोध का वेग इतना प्रबल होता है कि अधिकतर समाज के विरुद्ध चलने वाला ही टूट जाता है| रिश्तेदारों ने ताना मारा ‘क्या एक ही बेटी की शादी करनी है? ….. अरे एक को ब्याहोगे तो दूसरी के बारे में सोचोगे …. तुमने तो लड़की को बहुत छूट दे रखी है|’ शुभ चिंतकों ने समझाया ‘लड़की पराया धन होती है, आखिर इसने जाना तो दूसरे ही घर है……. आज रिश्ते मिल रहे हैं कल शायद न मिलें|’
स्नेहा काफी देर तक किंकर्तव्यविमूढ़ होकर सोचती रही| बुआ की बातों में भी सच्चाई थी इसलिए वह उस पर क्रोध भी न कर सकी| उसका मन बहुत अशांत हो गया, सोचने लगी ‘लड़कियों की भी क्या जिन्दगी होती है जिस घर में जन्म लेती है उसी में पराया धन कही जाती है ….. फिर जरा सी बड़ी हुई नहीं कि माता-पिता उसके हाथ पीले करने के चक्कर में अपने सिर के बाल सफेद कर लेते हैं|’ उसके साथ अकसर ऐसा ही होता | जब भी कोई वर-पक्ष उसके घर विवाह प्रस्ताव लेकर आता वह क्षुब्ध हो जाती| जब उसे कुछ नहीं सूझता तो वह अमित के घर भाग जाती|
अमित का स्नेहा से परिचय उन दिनों से था जब वह स्नातक के अंतिम वर्ष में था तथा स्नेह बाहरवीं कक्षा की छात्रा थी| स्नेहा के पिता के आग्रह पर उसने स्नेहा को कुछ दिनों के लिए गणित पढ़ाया था| चूंकि वह एक प्रतिभाशाली होनहार छात्र था और स्नेहा प्रथम दिवस से ही उसकी प्रतिभा की कायल हो गयी थी| इसलिए दोनों में दोस्ती हो जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं थी| आरंभ में वे मात्र दोस्त थे मगर फिर कब और कैसे एक-दूसरे के मन-मीत बन गये, स्वयं उन्हें भी पता न चला| इस बीच अमित बड़ी तेज गति से आगे बढ़ता गया और देखते ही देखते उसी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हो गया जहां स्नेह दर्शन निष्णात की उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही थी|
अमित का स्वभाव आरंभ से ही अंतरमुखी था| वह तो खुलकर हँसता भी नहीं था, बोलता था तो वह भी बड़ा नाप-तोल कर, कम से कम शब्दों का प्रयोग करते हुये| जहां स्नेहा एक आधुनिक परिवार से थी वहीं अमित एक मध्यम वर्गीय ग्रामीण परिवार से संबंध रखता था| स्नेहा उसे दिल की गहराईयों से प्रेम करने लगी थी| वो घंटों बैठकर उसका इंतजार करती सिर्फ उसकी एक झलक पाने के लिये|
अमित अकसर शंका प्रकट करता, “तुम बड़े घर की बेटी हो, मेरे घर में एडजस्ट हो पाओगी?” “और दूसरा विकल्प भी क्या है?” स्नेहा हंसकर प्रति प्रश्न करती| उनकी हंसी से सारा वातावरण संगीतमय हो जाता| उस दिन भी वह थोड़ी देर बाद अमित के सामने थी| अमित उसकी सूरत देखते ही सारी बात समझ गया, वैसे भी यह उसके लिये कोई नई बात नहीं थी| वह जब भी इस प्रकार की दुविधा में होती वह बिना कुछ सोचे-समझे उसी के पास भागती| वह हर बार उसे एक ही आश्वासन देता कि वह सब संभाल लेगा|
उस रोज भी उसने यही कहा था लेकिन स्नेहा को इससे संतोष नहीं हुआ| वह कुछ ज्यादा ही घबरा गयी थी| उसने आग्रहपूर्वक कहा, “अमित ऐसे कब तक चलेगा, आखिर तुम अपने मम्मी पापा से बात क्यों नहीं करते, मैं कब तक तुम्हारा इंतजार करती रहूंगी?” सहसा अमित गंभीर हो गया| “तुम अच्छी तरह से जानती हो कि मेरी अभी नई-नई नौकरी लगी है| जब तक मैं पूरी तरह से सैटल नहीं हो जाता मैं उनसे कोई बात नहीं कर सकता|” स्नेहा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की, वो चुपचाप उसके चेहरे के भावों को पढ़ती रही|
अमित ने थोड़ा रूककर फिर कहना शुरू किया, “देखो स्नेहा, हमारा विवाह एक संघर्ष है एक तो अंतरजातीय विवाह के लिये घर वालों को राजी करना ही टेढ़ी खीर है दूसरे मेरे पिता जी ज्योतिष विद्या में न केवल विशवास करते हैं अपितु इस विद्या का अच्छा ज्ञान भी रखते है| इसलिये सबसे पहले तो वे हमारी जन्म-पत्रियाँ मिलायेंगे, जिनके मिलान पर ही हमारा विवाह संभव है|”
स्नेहा का खून खौल उठा| वह चीखकर कहना चाहती थी, “क्या प्रेम करते समय भी तुमने अपने माता-पिता की आज्ञा ली थी? उस समय भी जन्मपत्री मिलान कर लेना था|” परन्तु वह इतना ही कह पायी “यदि जन्मपत्री न मिली तो?” अमित ने थोड़ा संकुचाते हुये कहा “तो मुझे सबसे अधिक दुःख होगा क्योंकि मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूं ….. तुम्हारे बिना मेरे जीवन का अर्थ ही क्या है….. मगर अपने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध चलने का साहस मैं कभी नहीं कर सकता|”
स्नेहा कल्पना की ऊँची उडान भरते-भरते अचानक एक झटके से धरती पर आ गिरी, उसके सपनों का घरोंदा तिनके-तिनके होकर बिखर चुका था| दिल का टूटना क्या होता है यह उसे आज मालूम हुआ| आँखों में प्रतिशोध की ज्वाला लिए वह सोचने लगी, ‘क्या यही वह अमित है जिसके प्रेम के बूते पर वह दुनिया से टक्कर लेने जा रही थी| उसका प्रेम इतना कच्चा था कि वह हवा का हल्का सा एक झोंका भी बर्दाश्त नहीं कर सका?’ अमित की बातों ने स्नेहा से जैसे शब्द ही छीन लिए थे| उसमें इतनी भी शक्ति नहीं रही थी कि वह कोई प्रतिक्रिया कर सके| वह धीरे से उठी व चुपचाप कक्ष से बाहर निकल गयी|
अगले दिन वह विश्वविद्यालय के लिए निकलने ही वाली थी कि अमित की छोटी बहन पल्लवी आ धमकी| दुआ-सलाम के बाद अत्यंत मधुर स्वर में बोली, “कल रात बहुत देर तक भैया से तुम्हारी बातें होती रहीं, वे पिता जी से बात करने को तैयार हो गये हैं इसलिए भैया ने आज तुम्हें बुलाया है, अपनी जन्मपत्री भी साथ ले चलो| पिता जी भी तो जन्मपत्री मिलायेंगे, क्यों न यह काम हम लोग स्वयं ही कर लें| लाल टिब्बे वाले मंदिर के पुजारी जी भैया के परिचित है|”
कोई और दिन होता तो वह भागकर अमित के पास पहुंच जाती, मगर उस दिन उसने चुपचाप अपनी जन्मपत्री निकालकर पल्लवी को दे दी, परन्तु स्वयं साथ चलने से इन्कार कर दिया|
आज अमित बहुत प्रसन्न था उसने अपनी व स्नेहा की जन्मपत्री का मिलान करवा लिया था| लाल टिब्बे वाले मंदिर के पुजारी ने छतीस में से बतीस गुण मिलाकर कहा था, “वाह भगवान ने क्या जोड़ी बनाई है लगता है ये दोनों तो बने ही एक दूजे के लिये हैं|” अमित की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था| वह यह खुशखबरी सुनाने के लिए रात को ही स्नेहा से मिलना चाहता था लेकिन किसी तरह उसने सुबह का इंतजार किया| सुबह से ही उसकी आँखें दरवाजे पर लगी थीं| स्नेहा आठ-नौ बजे के मध्य उसके घर पहुंच जाती थी जहां से वे इकट्ठे विश्वविद्यालय जाते थे| मगर आज स्नेहा नहीं आयी| उसके मन में तरह-तरह के विचार आने लगे ‘कहीं स्नेहा मुझ से नाराज तो नहीं ….. ऐसा तो कभी नहीं हो सकता ….. मुझ से मिले बिना तो वह एक दिन भी नहीं रह सकती फिर क्या बात हो सकती है ….. कल भी नहीं आई और आज भी ….कहीं बीमार तो नहीं?’ बहुत इंतजार करने के बाद वह अनमना-सा उठा और बोझिल कदमों से विश्वविद्यालय की ओर चल दिया|
विश्वविद्यालय पहुंचते ही उसे एक जोरदार झटका लगा| स्नेहा अपनी सहेलियों के बीच निश्चिंत भाव से खिलखिला रही थी| उसने उसी क्षण स्नेहा को एकांत में तलब किया, “स्नेहा तुम कल आयी क्यों नहीं, आज भी मैं सुबह से तुम्हारा इंतजार कर रहा था| तुम सोच भी नहीं सकती कि आज मैं तुम्हें कितनी बड़ी खुशखबरी देने वाला हूं, तुम्हें पता है हमारी जन्मपत्रियाँ मिल गयी हैं| ये देखो पंडित जी ने कितना अच्छा मिलान किया है|”
अमित एक ही सांस में सब कुछ कह गया| उसने शीघ्रता से वह कागज जिस पर जन्मपत्रियाँ का मिलान किया गया था स्नेहा के हाथों में रख दिया| अचानक स्नेहा का चेहरा गुस्से से सुर्ख लाल हो गया | उसने उस कागज के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और कठोर स्वर में बोली- “तुम मुझ से प्रेम करते हो या नहीं यह मैं नहीं जानती लेकिन मैं ऐसे प्रेम को प्रेम नहीं मानती जिसकी बुनियाद शर्तों पर रखी जाए| आखिर हमारे प्रेम का आधार क्या है, महज एक टुकड़ा कागज?”
यह कहकर उसने उस कागज के टुकड़े वहीं बिखेर दिये और तेज-तेज कदमों से आगे बढ़ गयी|
रणजोध सिंह



