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February 10, 2026 10:41 pm

भारतीय रंगमंच के एक अग्रणी निर्देशक, नाटक शिक्षक और स्वतंत्र भारत के आधुनिक रंगमंच के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व

इब्राहीम अलकाजी (18 अक्टूबर 1925 – 4 अगस्त 2020) भारतीय रंगमंच के एक अग्रणी निर्देशक, नाटक शिक्षक और स्वतंत्र भारत के आधुनिक रंगमंच के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों में से एक थे। उन्हें अक्सर “समकालीन भारतीय रंगमंच के पिता” या “स्वतंत्र भारत के रंगमंच के दिग्गज” कहा जाता है। उन्होंने पेशेवर दृष्टिकोण, कठोर प्रशिक्षण और दूरदर्शी नेतृत्व से भारतीय रंगमंच में क्रांति लाई।
प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि
पुणे (तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत) में जन्मे अलकाजी का परिवार अरब मूल का था। उनके पिता एक धनी बेदौइन व्यापारी थे, जो वर्तमान सऊदी अरब के उनाiza से थे, और माँ कुवैती थीं। वे नौ भाई-बहनों में से एक थे और सुख-सुविधा भरे माहौल में पले-बढ़े। 1947 के विभाजन के बाद उनके अधिकांश परिवार के सदस्य पाकिस्तान चले गए, लेकिन अलकाजी भारत में ही रहे। उन्होंने भारतीय स्कूलों में शिक्षा प्राप्त की और पिता से अरबी भाषा व इस्लामी शिक्षाओं का ज्ञान लिया, जिससे उनकी सहिष्णुता और वैश्विक दृष्टिकोण विकसित हुआ।
शिक्षा और शुरुआती करियर
अलकाजी ने बॉम्बे (अब मुंबई) के सेंट जेवियर्स कॉलेज में पढ़ाई की, जहाँ उन्होंने सुल्तान “बॉबी” पदमसी के नेतृत्व वाले इंग्लिश थिएटर ग्रुप से रंगमंच का परिचय पाया।
1948 में वे लंदन गए और प्रतिष्ठित रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट (RADA) में प्रशिक्षण लिया, जहाँ उन्हें अभिनय, निर्देशन और प्रोडक्शन के अंतरराष्ट्रीय मानकों का ज्ञान हुआ। लंदन में अच्छे अवसर मिलने के बावजूद, उन्होंने 1951 में भारत लौटकर अपनी मातृभूमि के सांस्कृतिक क्षेत्र में योगदान देने का फैसला किया।
बॉम्बे में रंगमंच योगदान
भारत लौटकर अलकाजी ने 1954 में अपनी पत्नी रोशन अलकाजी और अन्य लोगों (जैसे कवि निस्सिम इज़ेकील) के साथ थिएटर यूनिट की स्थापना की। इस समूह ने रंगमंच को पेशेवर बनाया—स्टेज मैनेजमेंट, लाइटिंग, प्रॉप्स, चरित्र विकास आदि पर जोर दिया। उन्होंने कई नाटक निर्देशित किए और भारतीय रंगमंच को शौकिया परंपराओं से अनुशासित, आधुनिक स्तर पर ले गए।
वे दृश्य कला में भी सक्रिय रहे और 1950 के दशक में मुंबई के जहांगीर आर्ट गैलरी में “दिस इज मॉडर्न आर्ट” जैसी प्रदर्शनियाँ आयोजित कीं। वे वी.एस. गायतोंडे, अकबर पदमसी, त्येब मेहता और नसरीन मोहामेदी जैसे कलाकारों से जुड़े रहे।
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में नेतृत्व
अलकाजी का सबसे बड़ा योगदान 1962 से 1977 तक नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD), नई दिल्ली के निदेशक के रूप में रहा—यह NSD का सबसे लंबा कार्यकाल है। उन्होंने NSD को RADA जैसा मॉडल दिया: कठोर शैक्षणिक मानक, तकनीकी अनुशासन, अंतरराष्ट्रीय तकनीकें और लोकतांत्रिक कार्य नैतिकता।
उनके नेतृत्व में NSD भारत का प्रमुख रंगमंच प्रशिक्षण संस्थान बना। उन्होंने नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, सुधा शिवपुरी, रोहिणी हट्टंगड़ी और बी.वी. करंत जैसे दिग्गजों को प्रशिक्षित किया। उन्होंने 50 से अधिक नाटक निर्देशित किए, जैसे गिरीश कर्नाड का तुगलक, मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन आदि—अक्सर खुले मैदान या नवीन स्थानों पर। अलकाजी ने रंगमंच को “राष्ट्रीय” बनाने का प्रयास किया, पूरे भारत से छात्रों को जोड़ा और क्षेत्रीय/लोक परंपराओं को आधुनिक रूपों के साथ जोड़ा, जिससे स्वतंत्र भारत में सांस्कृतिक एकीकरण हुआ।
वे सख्त अनुशासक थे, जिन्होंने पेशेवरता और उत्कृष्टता सिखाई, हालांकि उनकी शैली कभी-कभी विवादास्पद रही।
बाद के वर्ष और अन्य कार्य
1970 के दशक में नौकरशाही और राजनीतिक बाधाओं (आपातकाल सहित) से निराश होकर उन्होंने 1977 में NSD से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वे दृश्य कला पर केंद्रित हुए और पत्नी रोशन के साथ दिल्ली में आर्ट हेरिटेज गैलरी की सह-स्थापना की। वे भारतीय कला के संग्राहक, संरक्षक और अंतरराष्ट्रीय प्रचारक बने।
विरासत और सम्मान
अलकाजी ने 50 से अधिक नाटक निर्देशित किए और आधुनिक हिंदी रंगमंच को आकार दिया, परंपरा और नवाचार को जोड़ा। उन्हें पद्म विभूषण (भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान) सहित कई पुरस्कार मिले। उनकी बेटी अमल अल्लाना ने उनकी जीवनी Ebrahim Alkazi: Holding Time Captive (2024) लिखी, जिसमें उनके रंगमंच और दृश्य कला के प्रति प्रेम को उजागर किया गया है।
4 अगस्त 2020 को नई दिल्ली में 94 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। वे स्वतंत्र भारत में रंगमंच को पेशेवर और ऊँचा उठाने वाले राष्ट्र-निर्माता के रूप में याद किए जाते हैं।

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