पत्रकारों द्वारा मंडी के चक्कर प्लांट में पशुपालकों द्वारा दूध फेंके जाने की घटना से जुड़े सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि सरकार हर दिन यह दावा करती है कि उसने दूध के दाम में ऐतिहासिक वृद्धि की है और कई सुविधाएं दी हैं। बिहार से लेकर असम के चुनाव में भी मुख्यमंत्री यही कहते नजर आए। लेकिन उनके अपने प्रदेश और गांव की हकीकत क्या है, यह चक्कर में फेंके गए दूध से साफ हो गई। यह कोई पहला मामला नहीं है जब इस तरह की घटना हुई हो। मण्डी, रामपुर, आनी और बंजार के इलाकों में यह समस्या आम हो चुकी है। दूध न खरीदने और भुगतान महीनों तक न करने को लेकर आए दिन पशुपालकों और हिमफेड के बीच विवाद होते रहते हैं। यह सरकार सिर्फ विज्ञापनों और देशभर में घूम-घूमकर चुनावी प्रचार में ही पशुपालकों का दूध खरीद रही है, जबकि जमीनी हकीकत सरकारी दावों से बिल्कुल विपरीत है। सरकार को सोचना चाहिए कि एक-एक बूंद दूध के लिए पशुपालकों को कितनी मेहनत करनी पड़ती है। ऐसे में सरकार जब चाहे उनका दूध खरीदे और जब चाहे मना कर दे, यह नहीं चलेगा। आज मुख्यमंत्री के झूठे दावों की पोल खुल गई है, क्योंकि किसान थक-हार कर दूध सड़कों पर बहाने को मजबूर हो रहे हैं।





