सबकी खबर , पैनी नज़र

May 6, 2026 6:23 pm

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May 6, 2026 6:23 pm

आज जॉइंट एक्शन कमेटी (JAC) की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई

हिमाचल प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य प्रदेश सरकार द्वारा CAS (Career Advancement Scheme) के अंतर्गत प्राध्यापकों की लंबित पदोन्नतियों को लागू न किए जाने के मुद्दे पर विचार-विमर्श करना था। बैठक में सर्वसम्मति से इस स्थिति को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण, शिक्षाविरोधी तथा प्राध्यापकों के अधिकारों का खुला उल्लंघन बताया गया।
बैठक में प्रदेश के सभी प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों से प्रतिनिधियों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि यह मुद्दा केवल किसी एक संस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राज्य के उच्च शिक्षा तंत्र को प्रभावित कर रहा है। हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय से जॉइंट एक्शन कमेटी के अध्यक्ष प्रो. जनार्दन सिंह, सरदार पटेल विश्वविद्यालय से उपाध्यक्ष डॉ. सुनील, वेटनरी कॉलेज ऑफ साइंस से डॉ. प्रदीप, कृषि विश्वविद्यालय के अध्यक्ष डॉ प्रवीण शर्मा एवं संयुक्त सचिव डॉ रविन्द्र सिंह , डॉ. देवेश ठाकुर, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से अध्यक्ष एवं जॉइंट एक्शन कमेटी के महासचिव प्रो. नितिन व्यास, डॉ. अंकुश भारद्वाज, डॉ. योगराज तथा डॉ. गौरव भारद्वाज सहित अनेक शिक्षकों ने भाग लिया।
बैठक में वक्ताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि CAS के अंतर्गत प्राध्यापकों की पदोन्नति केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उनके शैक्षणिक योगदान, शोध कार्य, अनुभव एवं योग्यता का सम्मान है। इसे रोकना या अनावश्यक रूप से लंबित रखना न केवल शिक्षकों के मनोबल को गिराता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। वक्ताओं ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुरूप CAS को लागू करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, और इसमें किसी भी प्रकार की देरी या उदासीनता अस्वीकार्य है।
जॉइंट एक्शन कमेटी ने प्रदेश सरकार की इस नीति को “कुंभकर्णी नींद” की संज्ञा देते हुए कहा कि सरकार शिक्षकों की वर्षों पुरानी मांगों की अनदेखी कर रही है। यह न केवल शिक्षकों के साथ अन्याय है, बल्कि उच्च शिक्षा के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है। बैठक में यह भी चिंता व्यक्त की गई कि यदि समय रहते इस मुद्दे का समाधान नहीं किया गया, तो योग्य एवं प्रतिभाशाली शिक्षक हतोत्साहित होंगे, जिससे राज्य के शैक्षणिक संस्थानों की साख पर भी आंच आएगी।
बैठक के दौरान यह भी रेखांकित किया गया कि CAS केवल पदोन्नति का विषय नहीं है, बल्कि यह शिक्षकों के मूल अधिकारों से जुड़ा हुआ मुद्दा है। शिक्षकों ने इसे अपने संवैधानिक एवं पेशेवर अधिकारों का हनन बताया और कहा कि इस प्रकार की नीतियां लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध हैं। जॉइंट एक्शन कमेटी ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने शीघ्र ही इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो आंदोलन को और अधिक व्यापक एवं तीव्र किया जाएगा।
इसी संदर्भ में बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि 11 मई 2026 को प्रदेश भर के सभी विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में शैक्षणिक कार्यों का पूर्ण बहिष्कार किया जाएगा। इस दिन सभी शिक्षक कक्षाओं, परीक्षाओं एवं अन्य शैक्षणिक गतिविधियों से स्वयं को अलग रखते हुए सरकार के इस निर्णय का विरोध दर्ज करेंगे। यह कदम सरकार को शिक्षकों की एकजुटता और उनके संकल्प का स्पष्ट संदेश देने के लिए उठाया जा रहा है।
जॉइंट एक्शन कमेटी ने प्रदेश के सभी शिक्षकों से आह्वान किया है कि वे इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लें और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट रहें। साथ ही, यह भी अपील की गई कि छात्र समुदाय एवं समाज के अन्य वर्ग भी इस मुद्दे की गंभीरता को समझें और शिक्षकों के समर्थन में आगे आएं, क्योंकि यह संघर्ष अंततः शिक्षा की गुणवत्ता और भविष्य से जुड़ा हुआ है।
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि आने वाले दिनों में विभिन्न विश्वविद्यालयों में जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे, जिसमें शिक्षकों को CAS के महत्व एवं वर्तमान स्थिति के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाएगी। इसके अतिरिक्त, सरकार तक अपनी मांगों को प्रभावी ढंग से पहुंचाने के लिए ज्ञापन, धरना-प्रदर्शन एवं अन्य लोकतांत्रिक माध्यमों का भी सहारा लिया जाएगा।
अंत में, जॉइंट एक्शन कमेटी ने प्रदेश सरकार से पुनः आग्रह किया कि वह इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल संज्ञान ले और CAS के तहत प्राध्यापकों की लंबित पदोन्नतियों को शीघ्र प्रभाव से लागू करे। यदि सरकार ने समय रहते इस पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो इसका खामियाजा पूरे शिक्षा तंत्र को भुगतना पड़ेगा।
जॉइंट एक्शन कमेटी यह स्पष्ट करना चाहती है कि उनका उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि न्याय की प्राप्ति है। शिक्षक हमेशा से समाज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं, और उनका सम्मान एवं अधिकार सुरक्षित रखना किसी भी प्रगतिशील समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए।