
विचार करने वाली बात यह है कि “दिवाली भी कभी बुढी हो सकती है?” दिवाली जीतनी बुढी, उतना ही जोश और उल्लास के साथ कैसे मनाई जाती है सभी सवालों के जवाब शायद आपको यहां मिल जाएं। बुढी दिवाली की इस धार्मिक पर्व का शुभारंभ मुशिर माह की अमावस्या (भिम की अमावस्या) वाली रात्री में मशालें जलाकर किया जाता है। स्थानिय लोगों की बुढी दिवाली मनाए जाने के संदर्भ में अलग-अलग धारणाएं हैं।दिपावली के पुरे एक महिने बाद सिरमौर ज़िल्ले में मनाई जाती है बुढी दिवाली। यह पर्व क्रमश: पडोई, जंदोई तथा जंदोऊडा के नाम से मनाया जाता है। पडोई:अमावस्या का अगला दिन पडोई के नाम से मनाया जाता है। इस दिन सभी लोग कुल देवता के मंदिर जाकर साजी मनाते है। इस दिन मेहमान बनकर आई सभी औरतें सामुहिक प्रांगण मे भिंऊंरी गाती है। जंदोई: पडोई का अगला दिन जंदोई के नाम से मनाया जाता है। इस दिन सैंकडों की संख्या में ग्रामिणवासी सामुहिक प्रांगण में इक्कट्ठे होते है।लोक गीत, लोक न्रत्य तथा खेलो (करयाला) जैसी लोक शैलियों से जन समुह का मनोंरजन होता है।जंदोऊडा: जंदोई के अगले दिन को जंदोऊडा के नाम से मनाया जाता है। इस दिन भी लोक गीत, लोक न्रत्य और खेलो(करयाला) के माध्यम से आपसी भाईचारे की झलक यहां देखने को मिलती है। इस दिन द्राबिल गाँव मे मनाई जाने वाली बुढी दिवाली प्रदेश भर में विख्यात है। बुढी दिवाली के पारंपरिक तथा सांस्क्रतिक स्तंभ: बुढी दिवाली के पारंपरिक तथा सांस्क्रतिक स्तंभ: लोक व्यंजन, लोक संगीत, लोक न्रत्य तथा लोक नाट्य (खेलो) लोक व्यंजन: बुढी दिवाली के सुअवसर पर मेहमानों की ख़ातिरदारी मुडी और अख़रोट खिलाकर की जाती है। इस धार्मिक पर्व के दौरान पारंपरिक पकवान जैसे सिढु,पटांडे,तेलपाकीऔर शाकुली खिलाकर खुब खातिरदारी की जाती है। लोकसंगीत: लिंबर, हारुल तथा खेलो जैसे लोक पारंपरिक शैलियां “बुढी दिवाली” पर्व की शोभा बढाते है। लोक न्रत्य: इस पर्व मे मुख़्यत: माला न्रत्य ही देखने को मिलता है। इसे अलग-अलग अंदाज़ में प्रस्तुत किया जाता है। लोक नाट्य (खेलो): खेलो “बुढ़ी दीवली” की “परंपरागत लोक शैलियों” में से एक हैं। “करियाला शैली” लगभग हर जिले में चर्चित हैं। तथा यह रंगमंचिय शैली भिन्न-भिन्न नाम से जानी जाती है। जिल्ला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र में इस रंगमंचिय शैली को “खेलो या खेल” के नाम से जाना जाता है। यह विशेषकर “दिवाली” तथा “बूढ़ी दिवाली” के पावन अवसर पर ही देखने को मिलता है। इसे यहां के स्थानीय बोली में ही प्रस्तुत की जाती है। जिला सिरमौर: सिरमौर जिला हिमाचल प्रदेश के पुर्व दक्षिण हिमालय में स्थित एक क्रषि प्रधान क्षेत्र है। इसे सामान्यता शिवालिक रेंज के रूप में जाना जाता है। यह जिला अपनी प्राकृर्तिक सुंदरता, उपयुक्त वातावरण, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, अनेक दर्शनीय स्थलों के कारण पर्यटकों के लिये आकर्षण का केंद्र है। ज़िल्ले के हर गाँव में आपको मंदिर देखने को मिलेंगे, यह मंदिर स्थानिय लोगों की देवी देवताओं के प्रति आस्था को व्यक्त करते है।“बुढी दिवाली”
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