सबकी खबर , पैनी नज़र

June 28, 2026 11:08 pm

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भगवान शिव के रूप शिरगुल महाराज के दर चूड़धार पर्वत पर भक्तों का तांता

दुर्गम और कठिन राह पर आस्था भारी रिकॉर्ड 50 हजार श्रद्धालु पहुंचे: बी आर शर्मा

चंडीगढ़: पवन चोपड़ा, हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले शिवालिक की सबसे ऊंची चोटी चूड़धार पर्वत पर भगवान भोले शंकर के रूप विराजमान शिरगुल महाराज जी की नगरी में इन दोनों देश और विदेश पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। जिस प्रकार से केदारनाथ ,उत्तराखंड, किन्नर कैलाश किन्नौर, श्रीखंड हिमाचल प्रदेश यात्रा बहुत ही कठिन यात्राओं में से एक मानी जाती है ।उसी प्रकार चूड़धार चूड़ेश्वर महादेव की यात्रा भी ऐसी ही कठिन यात्राओं में एक है।

*चूड़धार है शिरगुल महादेव की तपोस्थली: बी आर शर्मा

जानकारी देते हुए चूड़ेश्वर सेवा समिति चूड़धार के प्रबंधक बी आर शर्मा ने बताया चूड़धार पर्वत शिरगुल महाराज तपस्थली है। जहां पर इन्होंने कठिन तप किया था। इसके अलावा सिरमौर जिले के राजगढ़ शाया इनका जन्म स्थान बताया जाता है। पहाड़ी भाषा में सिर्फ का मतलब शिर मस्तिष्क या माथा और गुल पुष्प कहलाता है। इसका अर्थ है कि मस्तिष्क का फूल। उन्होंने बताया कि स्थानीय लोग इसे रक्षक के रूप में पूजते हैं। जोकि हर दुख संकट में यहां के लोगों की रक्षा करते हैं। इसके अलावा यहां पर जो भी व्यक्ति सच्चे मन से कोई भी मन्नत मांगता है वह पूरी होती है।

*पांडव भी आए थे यहां: 

शर्मा ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हरिपुरधार पंच भैया नामक स्थान पर पांडवों भी आए थे। इसके अलावा एक अन्य किंवदंती अनुसार के अनुसार इन्हें खाटू श्याम के रूप में भी पूजा जाता है। बताया जाता है कि वीर बर्बरीक शीश का इसी चोटी पर रखा गया था ।जहां से उन्होंने महाभारत का पूरा युद्ध देखा था।

*अब तक पहुंचे रिकॉर्ड 50 हजार श्रद्धालु*

मई माह से शुरू हुई इस यात्रा में अब तक 50000 श्रद्धालु भोले बाबा के दर्शन कर चुके हैं। जो कि अपने आप में रिकॉर्ड है। उन्होंने बताया कि यह यात्रा पांचवे महीने से शुरू होगा दसवें, ग्यारहवें महीने तक चलती है। जिसमें लगभग डेढ़ लाख तक श्रद्धालु आते हैं लेकिन अबकी बार यह आंकड़ा काफी अधिक हो सकता है। उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश हरियाणा पंजाब चंडीगढ़ के अलावा बंगाल बिहार असम उडीसा मध्य प्रदेश उत्तराखंड देश ही नही विदेश से भी लोग यहां पर पहुंचते हैं।

*ठहरने के लिए समिति करती है इंतजाम*

शर्मा ने बताया कि यहां पर 1000 के आसपास लोगों को ठहरने की सुविधा है। जिसमें जिसमें लोगों को ठहरने और खाने की सुविधा मंदिर समिति द्वारा मुफ्त दी जाती है। लेकिन इस बार श्रद्धालुओं का इतना तांता लगा है कि वह सुबह 5:00 बजे सेवा में लग जाते हैं और रात्रि 12 से 1:00 बजे तक व्यस्त रहते हैं। बरसाती मौसम में आंकड़ा घटकर कर 200 -300 प्रतिदिन रह जाता है।

*बेहद कठिन और दुर्गम राह पर आस्था भारी*

हरियाणा कुरुक्षेत्र से पूर्व डिप्टी एडवोकेट जनरल सतीश कुमार सिरोही, अंबाला के नारायणगढ़ एडवोकेट संजीव जोली इसके अलावा कुरुक्षेत्र से ही रेडियो जॉकी और शिक्षक डॉक्टर गौरव गर्ग जिन्होंने यह यात्रा पहली बार की उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि भोले बाबा की कृपा है जो इतनी मुश्किल राह होने के बावजूद भी भक्तों को अपने पास बुलाने को मजबूर कर देती है। जिसमें भक्त नाचते गाते और मस्त हो सभी रास्ते में आने वाली दिक्कतों को भुला बाबा की मस्ती में गाते हुए पहाड़ की ऊंची चोटी पर अपने मन की मुरादे मांगने के लिए पहुंच जाते हैं। यही नहीं भोले बाबा भी अपने भक्तों को खाली हाथ नहीं भेजते उनकी हर मुराद पूरी करते हुए सुख शांति का आशीर्वाद देते हैं।

*महिलाएं जाती हैं नंगे पांव*

जंगली, संकरे पथरीले ऊंचे नीचे कभी बारिश कभी ओलावृष्टि होने के बावजूद लगभग 14 किलोमीटर पैदल मार्ग पर श्रद्धालुओं में विशेष कर महिलाओं की आस्था को देखा हर कोई दांतो तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाता है। कैसे वे हिरनी की भांति चाहे गोद में नन्ना मुन्ना ही क्यों ना हो। अपनी मंजिल की ओर बढ़ी चली जाती है।

ट्रैकिंग,प्रकृति के दीवानों के लिए भी जन्नत से कम नही*

इस पर्वत श्रृंखला पर जहां वन्य प्राणी उद्यान है जिसमें विभिन्न प्रकार की जीव मिलते हैं। वनस्पतियों में दुर्लभ जड़ी बूटियों और प्राकृतिक मनमोहक दृश्य जिसमें पल में ही रंग बदलते मौसम कभी बारिश तो कभी पल में बादलों के बीच खुद को पाकर व्यक्ति किसी अन्य ही दुनिया में खो जाता है। इसके अलावा रास्ते में बहुत ही कठिन और दुर्गम पड़ाव भी आते हैं जो की ट्रैकिंग के शौकीन लोगों के लिए बहुत ही खास हैं। सर्दी के मौसम में यहां 15-20 फीट तक बर्फ गिरती है। जिसके चलते कई माह तक बाबा बर्फ से ढके रहते हैं।

जाने वाले बरते ये सावधानियां।                                        ऊंचे और दूरस्थ क्षेत्र में होने के चलते मोबाइल नेटवर्क बहुत ही कम मिलता है। इसके अलावा जंगली रास्ता होने के कारण रास्ता भटकने के चांस ज्यादा रहते हैं। इसलिए सभी जाने वालों को चाहिए कि एक दूसरे का साथ ना छोड़े और तय सुधा रास्ते पर ही चलें। बरसाती और गर्म कपड़े भी विशेष कर अपने पास रखें जिसमें टॉर्च लाठी डंडा होना भी अनिवार्य है। चलने में कभी भी जल्दबाजी न करें हो सके तो अंधेरा होने पर यात्रा से पूरा परहेज रखें।