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April 26, 2026 6:32 am

भ्रम जाल सुरेंद्र शर्मा शिव

वो जाल ओढ़े बैठा है चमन में
तुम भी न आ जाना कहीं भ्रम में
वो समझता है तुम हो तितली
तभी ये जाल बिछाया है चमन में

बात करता है जो मीठी तुमसे
कोई तो वजह होगी उसकी
कोई स्वार्थ भी हो सकता है उसका
जरूरी नहीं तू चाहत होगी उसकी

कौन जाने क्या आस लगाकर बैठा है
जो इन फूलों को यूं सजाकर बैठा है
जानता नहीं है तू क्या हश्र हुआ है उनका
जो भी जाकर इन फूलों पर बैठा है

तुझे लगता है वो कुछ नहीं जानता
है पहुंचा हुआ, वो सबकुछ है जानता
समझता है हर कमज़ोरी वो तेरी
है क्या हालत तेरी वो ये भी है जानता

है नहीं नया ये सब उसके लिए
बस तेरा किरदार नया हो गया है
जो फस गया जाल में उसके
वो फिर उसकी मर्ज़ी से ही गया है

है अभी भी वक्त, पहचान ले असलियत
अच्छी तरह परख ले बनने से पहले हम कदम
मैं ये नहीं कहता छोड़ दे तू उसे
लेकिन संभाल कर रखना इस चमन में कदम

चाहता है फिर भी जाना अगर
उसके भ्रम जाल में, वो तेरी रज़ा है
लेकिन कह रहा हूं तुमसे अभी भी
ये जाल जीवनभर की सज़ा है।