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March 13, 2026 4:49 pm

चीन के खिलाफ 21वीं सदी में भारत की जवाबी रणनीति

शिमला (हिमदेव न्यूज़) 23 अगस्त 2022 भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ, तब से लेकर आज तक भारत ने विभिन्न नेतृत्व के अंतर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, जनसंचार, आंतरिक एवं वाहय सुरक्षा में बहुत अधिक विकास किया है, तथा अंतराष्ट्रीय पटल पर भारत ने एक विशेष पहचान बनाई है। चीन भारत के पशचात् अक्टूबर 1949 को अस्तित्व में आया । कम्युनिस्ट विचारधारा के नेतृत्व में चीन प्राम्भिक वर्षों में संघर्षरत रहा लेकिन माओ के पशचात् देंग शियाओ पिंग के नेतृत्व में आर्थिक सुधारों से चीन आज विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिकी बन गया है चीन जब 1949 में अस्तित्व में आया तो भारत चीन को मान्यता देने वाला दूसरा राष्ट्र था । प्राम्भिक वर्षों में भारतीय नेतृत्व चीन के साथ मिलकर चलना चाहते थे तथा इसमें बहुत प्रयास भी किए गए जैसे हिंदू चीनी भाई -भाई , 1954 का पंचशील समझौता लेकिन ये अच्छे संबंध लम्बे समय तक चीन एवं भारत के बीच नहीं चल पाए कुछ ही समय बाद भारत और चीन का सीमा विवाद तथा 1959 में तिब्बत धर्म गुरु दलाई लामा को शरण देकर संबंधों में और दूरी उभरी जिसका कारण 1962 का युद्ध देखने को मिला । शीत युद्ध तक चीन विश्व में उतनी बड़ी शक्ति नहीं था,जितना स्थान वह आज के समय में रखता है कुछ विशेषज्ञों का मानना यह है कि आने वाले कुछ वर्षों में चीन अमेरिका का स्थान ले लेगा तथा विश्व ढाँचे को अपने आधार पर ढालेगा जिसकी शुरूआत वह अभी से कर चुका है । आज चीन दक्षिण एशिया तथा हिंद महासागर में अपने प्रभुत्व को स्थापित करना चाहता है जिसके आधार पर वह यहाँ के प्रत्येक राष्ट्र की नीतियों को प्रभावित कर सके तथा राष्ट्रों के निर्णयों को अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर प्रभावित कर सके । 21वीं शताब्दी के बदलते वैश्विक परिवेश में भारत और चीन के आर्थिक, राजनीतिक, रणनीतिक तथा दक्षिण भारत में शक्ति संघर्ष के रूप में देखा जा रहा है जिसकी शुरुआत चीन ने 15 जून 2020 की गलवान घाटी से कर ली थी तथा अब वह ताईवान में प्रवेश कर अपने पाँच अंगुलियों की विस्तारवादी नीति को पूरा करना चाहता है। चीन आज दक्षिण भारत में ना केवल भू- राजनीतिक रूप से अपने आप को मजबूत कर रहा है बल्कि राष्ट्रों को कर्ज जाल की नीति से अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं को पूरा करने में लगा हुआ है इस संदर्भ में श्रीलंका का उदाहरण देख सकते है तथा चीन द्वारा श्रीलंका के वंदरगाह पर अपने समुद्री जहाज की दस्तक भारत के हिन्द महासागर के लिए एक गंभीर विषय है । आज यदि हम भारत चीन के विश्व जी. डी. पी की बात करे तो चीन का योगदान 14.72 ट्रीलियन है वहीं भारत का योगदान मात्र 2.66% ट्रीलियन है । वहीं चीन का निर्यात भारत में 94.6% विलियन है वहीं भारत का मात्र 21.5% विलियन निर्यात भारत चीन को करता है । अतः प्रश्न अब यह उठता है कि भारत एवं चीन के आर्थिक, रणनीतिक अंतर को कम कैसे किया जाए ? भारत को यदि आने वाले समय में चीन का सामना करना है तो इस हेतू अपने आप को आंतरिक रूप से मजबूत करना होगा। जिससे वह वर्तमान युवा शक्ति का सकारात्मक रूप से प्रयोग कर सके यद्यपि इस संधर्व में भारत सरकार द्वारा ‘ मेक इन इंडिया ‘ जैसे अनेक प्रोग्राम चलाए हैं जो की काफी नहीं है। भारत में आज 64% जनसंख्या गाँव में रहती है अतः बिना गाँवो को सक्षम किए बिना हमारा देश उन्नति नहीं कर सकता इसलिए गाँवो के लिए कौशल आधारित शिक्षा, आधुनिक कृषि ,नए व्यवसाय खोजने की आवश्यकता है जिससे हमारा राष्ट्र अपने आप को आंतरिक रूप से मजबूत कर सके। क्योंकि बिना इन समस्याओं को हल किए भारत चीन का सामना नहीं कर सकता है। यदि कूटनीतिक स्तर पर चीन को रोकना है तो भारत को अमेरिका तथा रूस के साथ संतुलन बना कर चलना होगा , रूस -युक्रेन युद्ध के उपरांत चीन रूस में नज़दीकी बढ़ी है । जिससे की वह भारत तथा चीन के मध्य हस्तक्षेप न करे , ऐसी स्थिति में भारत का अमेरिका की ओर आने वाले समय में दक्षिण भारत तथा हिंद महासागर में मिलकर चीन को रोकना एक बुद्धिमानी भरा निर्णय होगा ।
लीलाधर ( पी.एच.डी छात्र एचपीयू)