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March 22, 2026 3:57 am

महर्षि अरविन्द
(5 दिसम्बर,1950/ पुण्य-तिथि)

Ravi Gaur:
Principal NR Bharti Sir: *
महर्षि अरविन्द का कहना था कि हम भारतीयों को अब यह गंभीरतापूर्वक सोचना आरंभ कर देना चाहिए कि भारतीय विचार, भारतीय बुद्धि, भारतीय राष्ट्रीयता, भारतीय आध्यात्मिकता और भारतीय संस्कृति को मानवजाति के सामान्य जीवन में कौन सी भूमिका अदा करनी है ।
मानवजाति को तो उत्तरोत्तर आगे बढ़ाना ही है । हमें इसके अंदर कार्य करना होगा और इसी का अंग बनना होगा । हम सभी में इसके प्रति अलगाव या ईर्ष्यायुक्त आत्मरक्षा की वृत्ति नहीं, बल्कि सब मनुष्यों और राष्ट्रों के प्रति उदार प्रतिस्पर्द्धा व भ्रातृत्व की भावना होनी चाहिए जिसे एक प्रकार की चेतना को मनुष्य के भविष्य में उचित स्थान प्राप्त हो, यही भारतीय भावना चाहिए ।” ऐसा शुचि और दिव्य चिंतन महर्षि अरविंद का था ।
अरविंद का जन्म 15 अगस्त, 1872 को कलकत्ता में हुआ था । उनके पिता कृष्णघन घोष एक सिविल सर्जन थे । माता का नाम स्वर्णलता देवी था । 7 वर्ष की अवस्था में ही अध्ययनार्थ वे अपने पिता द्वारा विलायत ले जाए गए । उन्हें हिंदू-संस्कार से दूर रखने का प्रयास किया गया ।
कैंब्रिज के किंग्स कॉलेज की ट्राइपोस की कठिन परीक्षा में विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण हुए । उन्होंने आई.सी.एस. की खुली प्रतियोगिता में भाग लिया और सर्वोच्च अंक प्राप्त किए थे । परंतु वे सरकारी गुलाम बनने को तैयार नहीं हुए । बड़ौदा राज्य की सेवा अंगीकार कर सन् 1893 में वे स्वदेश लौट आए ।
भारत आते ही अरविंद को अवर्णनीय अनुभूति हुई । उन्हें प्रतीत हुआ, मानो एक महान् ज्योति उनके अंतःकरण में प्रवेश कर गई हो । भारत का एक दिव्य आध्यात्मिक स्वरूप उनकी आँखों के समक्ष ठहर गया और उनमें प्रवेश कर गया, जिससे उन्हें चिर शांति प्राप्त हुई ।
विदेश में रहकर उन्होंने अनुभव किया था कि वे अब ‘अंधकार’ का पर्याय होते जा रहे हैं । इस स्वर्णिम अनुभूति से वह अँधेरा क्षणोपरांत छँट गया और वे प्रकाश, प्रज्ञान, प्रशांति से पूर्णत: उद्‌भाषित हो उठे । भारत की महिमा है ही ऐसी ! इसलिए अपने लोगों ने कहा है कि इसके कण-कण में पाविव्य भरा हुआ है ।
वहीं अनुभूति उनमें समा गई और उस अनुभूति की सार्थकता रेखांकित करने के लिए अरविंद ने भारतमाता को अपना प्रथम और अंतिम प्रणाम किया । आते ही वे भारत के समस्त वाड़मय और संस्कृति के गहन अध्ययन में लीन हो गए जिसमें अरविंद ने संस्कृत, बँगला, मराठी, गुजराती, हिंदी आदि भारतीय वाड़मय का विशद् अध्ययन किया ।
बड़ौदा कॉलेज में उन्होंने अंग्रेजी के प्राध्यापक के रूप में काफी समय तक सराहनीय कार्य किया । मृणालिनी देवी से उनका परिणय हुआ । अरविंद ने भगिनी निवेदिता से भेंट की । ‘काली माता’ नामक लब्ध प्रतिष्ठ ग्रंथ से वे अत्यंत प्रभावित हुए थे । साहित्यिक क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का प्रकाश फैलाने के उपरांत उन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में पदार्पण किया ।
उनके मन में भारत को स्वतंत्र कराने की लौ सदैव लगी रहती थी । इसीलिए उन्होंने सन् 1902 से देश की राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भाग लेना प्रारंभ कर दिया था । यही नहीं, उन्होंने क्रांतिकारी दोलन का गुप्त प्रचार करना भी आरंभ कर दिया था । सन् 1905 में महर्षि अरविंद ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक-प्रणीत ‘उग्र राजनीति’ का समर्थन किया था ।
बंग-भंग की घोषणा होते ही उन्होंने अपना ‘पाञ्चजन्य’ हूंका और सन् 1906 में वे कलकत्ता लौट आए । राष्ट्रीय शिक्षा द्वारा नवयुवकों में राष्ट्रीय भावना भरने के उद्‌देश्य से बंगाल राष्ट्रीय महाविद्यालय कलकत्ता में उन्होंने प्राचार्य-पद को समलंकृत किया ।
यहाँ से वे खुले रूप में क्रांति में कूद पड़े, कांग्रेस के मंच से स्वराज तथा विदेशी बहिष्कार के प्रस्ताव का अनुमोदन किया । सन् 1907 में वे जनमानस के सम्मुख उग्र पत्रकार के रूप में उभरे, जब उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ नामक साप्ताहिक समाचार-पत्र का संपादन आरंभ किया और वही ‘वंदे मातरम्’ तुरंत ब्रिटिश शासन कुए लिए सिरदर्द बन गया ।
ब्रिटिश सरकार ने उनपर राजद्रोह का अभियोग लगाया । वे बिना किसी चिंता के ही अपने उद्देश्य में लगे रहे । उन्होंने सूरत कांग्रेस की अध्यक्षता की । ‘भिक्षाम् देहि’ के स्थान पर उन्होंने ‘युद्धम् देहि’ का उद्‌घोष दिइग्श्दगंत में ध्वनित किया ।

सन् 1908 में वे किंग्स फोर्ड-हत्याकांड, अलीपुर बम-केस में गिरफ्तार कर लिए गए । जेल की यातना-कोठरी उनकी तपस्या-कुटीर बन गई थी । वहीं साधना में लीन एक दिन उन्हें ‘वासुदेव सार्वमिति:’ का साक्षात् हुआ । यहीं से उनके अंदर एक महान् परिवर्तन आया ।
भागवत-निर्णयानुसार उन्हें अभियोग से विमुक्ति मिली । उत्तरपाड़ा धर्मरक्षिणी सभा में उनका अभिभाषण हुआ । उन्होंने ‘कर्मयोगिन’ तथा ‘धर्म’ नामक साप्ताहिक समाचार-पत्रों का सफल संपादन भी किया । उनके विरुद्ध ब्रिटिश शासन ने कुचक्र रचकर पुन: मुकदमा चलाया, परंतु उन्होंने उस चांडाल-चौकड़ी की देश से निर्वासित करने की योजना विफल कर चंद्रनगर तथा पांडिचेरी में योग साधना में लीन हो गए ।
अब वे राजनीति का पूर्णरूपेण परित्याग कर सुदूर पांडिचेरी में योग-साधना करने लगे थे, जिसका समारंभ बड़ौदा रहते ही हो चुका था । अतीत की संपूर्ण आध्यात्मिक अनुभूतियों के सारभूत तत्त्वों को आत्मसात् कर ऐसी आध्यात्मिक शक्ति की खोज करते हुए जो सारे जीवन का रूपांतर कर उसे दिव्य बना दे, ‘पूर्णयोग’ के पथ का आविष्कार किया था और इसी की चरितार्थता में अंतिम चालीस वर्ष समर्पित हो गए ।
सन् 1914 में उन्होंने ‘आर्य’ नामक साप्ताहिक पत्र का संपादन किया । उन्होंने ईशोपनिषद् गीता, कर्मयोगिन् प्रबंध, दिव्य जीवन, योग समन्वय, हिंदू संस्कृति के मूल तत्त्व आदि का प्रकाशन कार्य किया था । 13 अप्रैल, 1941 को माँ का पांडिचेरी शुभागमन हुआ था, जहाँ अरविंद से उनकी भेंट हुई थी । सन् 1926 में आश्रम की स्थापना हुई । माँ पर संपूर्ण भार छोड़कर वे स्वयं अंतराल में चले गए थे, पर समाचार-पत्रों द्वारा साधकों का मार्ग-प्रदर्शन करते रहे ।
सन् 1945 में वे ‘क्रिप्स मिशन’ के प्रस्तावों को मान लेने के पक्ष में थे, क्योंकि भारत-विभाजन उन्हें स्वीकार नहीं था । उन्होंने कहा था कि अखंड, समर्थ तथा सशक्त भारत ही विश्व का पथ-प्रदर्शन करेगा।
*14 अगस्त, 1947 को, रेडियो तिरुचिरापल्ली से राष्ट्र के नाम संदेश में उन्होंने कहा था कि यह स्वतंत्रता तब तक अधूरी मानी जायेगी जब तक भारत-भूमि की अखंडता को पूर्ण नहीं बनाया जायेगा. उन्होंने कहा था कि यह राष्ट्र अविभाजित है और इसे कभी भी खंडित नहीं किया जा सकता है. हर राष्ट्र की एक आध्यात्मिक नियति है और good लगे थे और 5 दिसंबर, 1950 को महर्षि अरविंद ने महासमाधि ले ली ।
माँ के संरक्षण में उनका कार्य प्रतिफल प्रगति-पथ पर अग्रसर था । सन्1973 में माँ ने भी महाप्रयाण किया था । सन् 1951 में माँ ने अंतरराष्ट्रीय शिक्षा-केंद्र का उद्‌घाटन किया । सन् 1948 में संपन्न हुआ ‘ओरोविल’- उषा नगरी का शिलान्यास ।
*प्रदीप गोयल*
सेवा भारती चण्डीगढ़
[06/12, 8:54 pm] Principal NR Bharti Sir: 7 दिसम्बर / जन्मदिन
प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु प्रमुख स्वामी महाराज

बीएपीएस स्वामीनारायण संस्था की स्थापना 1907 में शास्त्रीजी महाराज ने की थी. प्रमुख स्वामी स्वामी नारायण संप्रदाय के पांचवें गुरू थे. 2016 में निर्वाण होने तक वे बीएपीएस के प्रमुख रहे. देश ही नहीं विदेशों में भी उनकी ख्याति है. खासकर हिंदू धर्म के प्रचार-प्रचार और मंदिरों के विस्तार में उनका अहम योगदान है.

स्वामी प्रमुख का जन्म वड़ोदरा जिले की पादरा तहसील में स्थित चाणसद गांव में 7 दिसंबर 1921 को हुआ था. प्राथमिक शिक्षा के बाद बचपन में ही वे घर त्यागकर आध्यात्म की ओर अग्रसर हो गए थे. 1940 में वे शास्त्री महाराज के शिष्य बने. शास्त्री महाराज के कहने पर श्रद्धेय संत ने नारायण स्वरूपदासजी के तौर पर अपना आध्यात्मिक सफर शुरू किया. धीरे-धीरे प्यार से इन्हें स्वामी प्रमुख के नाम से जाना जाने लगा.

1950 में महज 29 वर्ष की उम्र में स्वामी प्रमुख को बोचासणवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) का प्रमुख बना दिया गया. ऐसा नहीं था कि बीएपीएस में उनसे बड़े संत नहीं थे, लेकिन स्वामी प्रमुख की सेवाभाव, नम्रता और करुणा के चलते बीएपीएस की जिम्मेदारी स्वामी प्रमुख को दी गई. प्रमुख स्वामी जी महाराज 1971 में बीएपीएस के आध्यात्मिक प्रमुख बने और आजीवन रहे. बीएपीएस के प्रमुख के तौर पर उन्होंने हिंदू धर्म और हिंदू स्थलों का विस्तार करने में अतुलनीय योगदान दिया. आंकड़ों के लिहाज से देखें तो बीएपीएस के 44 शिखर बंध और तकरीबन 12 सौ मंदिर हैं. इनमें से 11 मंदिरों का निर्माण प्रमुख स्वामी के निर्देशन में ही हुआ. दिल्ली और अहमदाबाद में बना अक्षरधाम मंदिर प्रमुख स्वामी जी की देन है.

बीएपीएस का आध्यात्मिक प्रमुख बनने के बाद प्रमुख स्वामी ने अमेरिका की यात्रा भी की थी, इस यात्रा में उन्हें की टू द सिटी पुरस्कार से नवाजा गया था. बीएपीएस की वेबसाइट के अनुसार उस दौरान न्यूयॉर्क में पहला बीएपीएस मंदिर बनाया गया था. इसके बाद अगले चार दशकों में संयुक्त राज्य अमेरिका में 70 अन्य मंदिरों की स्थापना की गई जो पारंपरिक भारतीय शैली और हिंदू धर्म के प्रतीक हैं.

स्वामी प्रमुख का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है, यह रिकॉर्ड उनके नाम भारत से बाहर सबसे ज्यादा क्षेत्रफल में बनाए गए बीएपीएस के मंदिर के कारण मिला. यह मंदिर लंदन में स्थित है, जो डेढ़ एकड़ जमीन पर स्थापित है. इसमें 26300 पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है. इसके अलावा 1971 से सन् 2000 के बीच 11 देशों में 355 मंदिर बनाने का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड स्वामी प्रमुख के नाम दर्ज है.

13 अगस्त 2016 (आयु 94 वर्ष) सारंगपुर , गुजरात में स्वामी जी का निधन हुआ।
[06/12, 8:54 pm] Principal NR Bharti Sir: 7 दिसंबर
महत्त्वपूर्ण घटनाएँ –

1825 – भाप से चलने वाला पहला जहाज ‘इंटरप्राइज’ कोलकाता पहुंचा।
1856 – देश में पहली बार आधिकारिक रूप से ‘हिंदू विधवा’ का विवाह कराया गया।
1917 – अमेरिका प्रथम विश्व युद्ध का हिस्सा बना और- उसने ऑस्ट्रिया-हंगरी पर हमला किया।
1941 – दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान ने अमेरिका के पर्ल हार्बर पर मशहूर हवाई हमला किया।
1949 – भारतीय सशस्‍त्र बल फ्लैग डे मनाया जाता है।
2972 – अमेरिका चंद्रमा के लिये अपने अभियान के तहत अपोलो 17 का प्रक्षेपण किया।
1995 – भारत ने संचार उपग्रह इनसेट-2सी का प्रक्षेपण किया।
2995 -;अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसन्धान संस्था नासा का अंतरिक्ष यान गैलीलियो बृहस्पति पहुँच गया।
2008 – भारतीय गोल्फर जीव मिल्खा सिंह ने जापान टूर का ख़िताब जीता।

जन्मदिवस –

1879 – भारतीय क्रांतिकारी जतीन्द्रनाथ मुखर्जी का जन्म हुआ।
1889 – आधुनिक भारतीय संस्कृति और समाजशास्त्र के विख्यात विद्वान राधाकमल मुखर्जी का जन्म हुआ।
1890 – संघ के प्रारम्भिक कार्यकर्ताओं में से एक उच्च मनोबल के धनी डा. अन्ना साहब देशपांडे का जन्म हुआ।
1921 – महान संत प्रमुख स्वामी महाराज का जन्म हुआ।

पुण्यतिथि –

1997 – ज्योति मठ के शंकराचार्य स्वामी शांता नन्द जी का निधन हुआ।

महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव –
सशस्त्र सेना झंडा दिवस