
शिमला, दिनांक : 19 जून 2026, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई ने आज हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के दौरे पर पहुंचे प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री को एक विस्तृत मांग-पत्र सौंपते हुए विश्वविद्यालय में व्याप्त छात्र, शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय समस्याओं के समाधान हेतु तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। एसएफआई ने कहा कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय प्रदेश के हजारों विद्यार्थियों की उच्च शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र है, लेकिन वर्तमान समय में विश्वविद्यालय अनेक गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, जिनका सीधा प्रभाव विद्यार्थियों की शिक्षा, शोध, छात्र कल्याण और विश्वविद्यालय की संस्थागत साख पर पड़ रहा है। संगठन ने मुख्यमंत्री से इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करते हुए ठोस कदम उठाने का आग्रह किया।
एसएफआई ने कहा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाला संस्थान नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक चेतना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास का केंद्र भी है। ऐसे में विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था, वित्तीय पारदर्शिता और शैक्षणिक गुणवत्ता को मजबूत करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। संगठन ने अपने मांग-पत्र में विश्वविद्यालय से जुड़े आठ प्रमुख मुद्दों को उठाते हुए मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की।
सबसे प्रमुख मांग हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनावों की बहाली को लेकर उठाई गई। एसएफआई ने कहा कि छात्र संघ लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है और विद्यार्थियों को अपनी समस्याओं एवं मांगों को संस्थागत रूप से रखने का अवसर प्रदान करता है। छात्र संघ चुनाव बंद होने के बाद विद्यार्थियों की आवाज को कमजोर करने का प्रयास हुआ है तथा उनकी समस्याओं के समाधान की प्रक्रिया भी प्रभावित हुई है। संगठन का मानना है कि लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुरूप प्रत्यक्ष मतदान प्रणाली के आधार पर छात्र संघ चुनावों की पुनर्बहाली आवश्यक है। इससे विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता का विकास होगा, लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती मिलेगी और विश्वविद्यालय परिसर में स्वस्थ छात्र राजनीति को बढ़ावा मिलेगा।
संगठन ने विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा लगातार की जा रही फीस वृद्धि पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। एसएफआई ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में फीस में लगातार वृद्धि की गई है, जिसके कारण गरीब, ग्रामीण और मध्यमवर्गीय परिवारों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है। हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्य में बड़ी संख्या में विद्यार्थी आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं। ऐसे में फीस वृद्धि उच्च शिक्षा को आम विद्यार्थियों की पहुंच से दूर करने का कार्य कर रही है। संगठन ने मुख्यमंत्री से मांग की कि हाल ही में की गई फीस वृद्धि को तत्काल वापस लिया जाए तथा विश्वविद्यालय की वित्तीय समस्याओं का समाधान विद्यार्थियों पर बोझ डालकर नहीं बल्कि प्रशासनिक एवं वित्तीय सुधारों के माध्यम से किया जाए।
एसएफआई ने कहा कि विश्वविद्यालय के वित्तीय संकट का समाधान करने के लिए प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा आवश्यक है। संगठन ने मांग की कि विश्वविद्यालय में संसाधनों के बेहतर उपयोग को सुनिश्चित किया जाए, अनावश्यक पदों और खर्चों की समीक्षा की जाए तथा विभिन्न इकाइयों में उपलब्ध मानव संसाधनों का प्रभावी उपयोग किया जाए। विश्वविद्यालय के वित्तीय प्रबंधन में सुधार कर विद्यार्थियों पर आर्थिक बोझ डालने की आवश्यकता को समाप्त किया जा सकता है।
मांग-पत्र में विभागीय दोहराव और नियमित शिक्षकों के उपयोग का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। एसएफआई ने कहा कि विश्वविद्यालय में कई विषयों के लिए समान प्रकृति के विभाग संचालित किए जा रहे हैं, जिससे संसाधनों का अनावश्यक दोहराव हो रहा है और वित्तीय बोझ बढ़ रहा है। संगठन ने विभागों के युक्तिकरण की मांग करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया विद्यार्थियों के शैक्षणिक हितों को प्रभावित किए बिना लागू की जानी चाहिए। किसी भी पाठ्यक्रम को बंद करने या विद्यार्थियों के अवसरों को सीमित करने के बजाय प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए जाने चाहिए।
विशेष रूप से पर्यावरण अध्ययन विभाग का उल्लेख करते हुए एसएफआई ने कहा कि विभाग में नियमित शिक्षक उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें कई वर्षों से शिक्षण कार्य नहीं दिया जा रहा है, जबकि दूसरी ओर अतिथि शिक्षकों की नियुक्तियां की जा रही हैं। संगठन ने इसे सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग का उदाहरण बताते हुए कहा कि यूजीसी वेतनमान प्राप्त सभी नियमित शिक्षकों को तत्काल शिक्षण कार्य सौंपा जाना चाहिए। साथ ही विभागीय कार्यप्रणाली और समय-सारिणी में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध हो सके।
छात्रावासों की समस्या को विश्वविद्यालय के सबसे गंभीर मुद्दों में से एक बताते हुए एसएफआई ने कहा कि वर्तमान छात्रावास क्षमता विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। प्रदेश के दूरदराज क्षेत्रों से आने वाले हजारों विद्यार्थी आवासीय सुविधाओं के अभाव में निजी किराए के कमरों में रहने को मजबूर हैं, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। छात्राओं की स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि सुरक्षित एवं सुलभ आवास की उपलब्धता सीमित है। संगठन ने मांग की कि विश्वविद्यालय परिसर में एक नया छात्र छात्रावास तथा एक नया छात्रा छात्रावास शीघ्र निर्मित किया जाए ताकि अधिक से अधिक विद्यार्थियों को सुरक्षित और किफायती आवास उपलब्ध कराया जा सके।
एसएफआई ने विश्वविद्यालय में पूर्व में हुई शिक्षकों की भर्तियों की स्वतंत्र एवं न्यायिक जांच की मांग भी उठाई। संगठन ने कहा कि इन भर्तियों को लेकर समय-समय पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं तथा विभिन्न मंचों पर कथित अनियमितताओं की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता और पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए इन मामलों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता सामने आती है तो दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
विश्वविद्यालय में वित्तीय अनियमितताओं और निर्माण कार्यों में लागत वृद्धि का मुद्दा भी संगठन द्वारा उठाया गया। एसएफआई ने कहा कि विश्वविद्यालय में चल रही विभिन्न निर्माण परियोजनाओं और खरीद प्रक्रियाओं को लेकर कई सवाल सामने आ रहे हैं। विशेष रूप से एक निर्माण परियोजना की लागत में प्रारंभिक अनुमान की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। संगठन ने मांग की कि सभी प्रमुख निर्माण कार्यों, खरीद प्रक्रियाओं तथा प्रशासनिक व्ययों की स्वतंत्र वित्तीय समीक्षा करवाई जाए ताकि सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
मांग-पत्र में कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) के अंतर्गत दी गई पदोन्नतियों और वित्तीय लाभों की समीक्षा का मुद्दा भी शामिल था। एसएफआई ने कहा कि कुछ मामलों में निर्धारित प्रक्रियाओं और समयसीमा को लेकर प्रश्न उठे हैं। विश्वविद्यालय पर पड़ने वाले वित्तीय प्रभाव और प्रशासनिक पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए इन मामलों की स्वतंत्र समीक्षा की जानी चाहिए तथा यदि कोई अनियमितता पाई जाती है तो आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए।
संगठन ने यह भी कहा कि इन मुद्दों को लेकर पूर्व में कई ज्ञापन विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंपे जा चुके हैं, जो सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त तथ्यों और दस्तावेजों पर आधारित थे। बावजूद इसके आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इससे विद्यार्थियों और विश्वविद्यालय समुदाय के बीच असंतोष बढ़ रहा है। एसएफआई ने मुख्यमंत्री से मांग की कि संबंधित अधिकारियों को इन मामलों में समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जाएं।
प्रेस को जारी बयान में एसएफआई ने कहा कि उसकी सभी मांगें छात्र हितों, लोकतांत्रिक अधिकारों, वित्तीय अनुशासन, प्रशासनिक जवाबदेही और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जुड़ी हुई हैं। संगठन ने विश्वास व्यक्त किया कि यदि इन मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई की जाती है तो इससे न केवल विद्यार्थियों को लाभ होगा बल्कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की शैक्षणिक प्रतिष्ठा, संस्थागत विश्वसनीयता और वित्तीय सुदृढ़ता भी मजबूत होगी।
अंत में एसएफआई हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वे विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और कर्मचारियों की चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए मांग-पत्र में उल्लिखित सभी मुद्दों पर शीघ्र कार्रवाई सुनिश्चित करें। संगठन ने कहा कि उच्च शिक्षा को सुलभ, लोकतांत्रिक और गुणवत्तापूर्ण बनाए रखने के लिए एसएफआई निरंतर संघर्ष करती रहेगी और छात्र हितों की रक्षा के लिए अपनी आवाज बुलंद करती रहेगी।








