हितेश शर्मा/दुर्ग: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की जीवनदायनी नदी शिवनाथ के किनारे बसा एक गांव थनौद महज दो हजार की आबादी वाला गांव है. यहां की मिट्टी और सधे हुए हाथों का कमाल ऐसा है की छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के दस राज्यों में भी यहां के चर्चे हैं. यहां मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण और श्रृंगार स्वयं शक्ति स्वरूपा महिलाएं करती हैं.
इस गांव के लोग चार पीढ़ियों से मिट्टी की मूर्तियां गढ़ रहे हैं. इस गांव को मूर्तिकारों का गांव भी कहा जाता है. यहां के मूर्तिकार करीब सौ सालों से इस कारोबार से जुड़े हैं. इनकी बनाई मूर्तियों के लिए हर साल समितियों की कतारें लगतीं हैं. थनौद में मूर्तिकार परिवारों के करीब 50 से ज्यादा वर्कशॉप हैं. इन परिवारों का भरण पोषण इन वर्कशॉप से ही होता है.
वर्कशॉप में परिवार के बड़े- बुढों से लेकर महिलाएं व बच्चे पूरे साल मूर्ति बनाने में जुटे रहते हैं. यहां की बनी मूर्ति छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों सहित मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र,ओड़िशा,पश्चिम बंगाल,झारखंड सहित अन्य कई राज्यों में विक्रय की जाती हैं.
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यहां महिलाएं मां का ऐसा श्रृंगार कर उन्हें सजाती हैं, ऐसा लगता है मानों माता बोल उठेंगी. लाल साड़ी में सजी ”मां के पैरो में आलता, हाथों में चूडियां और हथेलियों पर खूबसूरत मेंहदी लगाई जाती है. उनके पांव में पायल और उनके हाथों में चूड़ी पहनाकर उनकी साड़ी को संवारा जाता है.
इस गांव की महिलाएं और लड़कियां सालों से अपने मूर्तिकार पिता और भाईयों का हाथ बंटाकर उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं. मूर्ति बनाने से लेकर उस पर मिट्टी का लेप और घिसाई तक ये लड़कियां करती हैं.
मूर्तिकार राधे चक्रधारी की पत्नी हीरा बाई बताती हैं कि वे भी अपने पति के साथ काम करती हैं. वह साल भर मूर्ति बनाती हैं, गणेश और माता की मूर्ति मिलाकर 100 के करीब मूर्तियां बन जाती हैं. एक मूर्ति बनाने में 4 से 5 महीना लगता है. जनवरी के महीने से ही गणेश और दुर्गा की मूर्ति बनाने का काम शुरू हो जाता है.
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