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March 19, 2026 5:29 pm

छोड़ दे गम, छोड़ जाने का (सुरेंद्र शर्मा शिव)

है आज भी हौंसले बुलंद उसके
चेहरे पर है ज़रा भी शिकन नहीं
टूटा है दिल जाने कितनी बार उसका
एक वो है कि उसे कोई फ़िकर नहीं

है जिंदगी इसी का नाम
गमों को भी स्वीकारना पड़ता है
चढ़ते सूरज को भी यहां
हर शाम अस्त होना पड़ता है

माना दिल लगाया इसने भी
दिल लगाना छोड़ा नहीं उसने तो
दिल टूट गया जब दोनों का
फिर भी आंसू बहाया नहीं उसने तो

कोई दिल टूटने से टूट जाता है
कोई खुद को संभाल जाता है
है यही फ़र्क दोनों में बस
हर कोई ये गम सह नहीं पाता है

जो झेल गया वो तैर गया
बाकि सब इस दरिया में डूब गए
जो डूब गए वो कहीं खो गए
वो तो इस जीवन से भी ऊब गए

है तुम्हें प्रणाम जो तैर गए
फिर न जिनके इस दरिया में पैर गए
भेद गए जो ये चक्रव्यूह भी
इस धरा पर वो फिर अमर हो गए

संभालो खुद को, हुआ कुछ नहीं
छोड़कर गया जो वो तेरा था नहीं
फिर क्या सोचना उसके बारे में
जो बेवफ़ा था तेरा साथी था नहीं।