सबकी खबर , पैनी नज़र

July 4, 2026 10:41 pm

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पुरुषत्व का दंभ त्याग, इसका सही अर्थ समझिये

आज अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस है। यह दिन पुरुषों की उपलब्धि और योगदान का जश्न मनाने और राष्ट्र, समाज, समुदाय और परिवार के निर्माण में उनके योगदान को याद करने का दिन है। इसकी शुरुआत त्रिनिदाद एवं टोबागो से हुई थी। संयुक्त राष्ट्र की मान्यता के बाद अब इसे दुनिया के चालीस से ज्यादा देशों में मनाया जाने लगा है। हमारी अपनी भारतीय संस्कृति में पुरुष के निर्माण और उसके जीवन के उद्देश्य की सबसे अद्भुत व्याख्या है। कहा गया है कि सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा ने अपनी काया को दो भागों में बांट दिया था। पहला हिस्सा ‘का’ हुआ और दूसरा ‘या’। पुरुष हिस्से को नाम दिया गया स्वयंभुव मनु और स्त्री हिस्से को शतरूपा। उन्हीं दोनों के मेल से पृथ्वी पर मनुष्यों की उत्पति हुई। इसे समझाने के लिए ईश्वर के अर्द्धनारीश्वर रूप की कल्पना की गई। अपने आप में संपूर्ण न तो पुरुष है और न ही स्त्री। अपनी रचना के बाद पुरुष अबतक अपने आधे हिस्से की तलाश में भटक रहा है। टुकड़ों में उस आधे हिस्से की उपलब्धि का सुख कभी उसे मां में मिलता है, कभी बहन में, कभी प्रेमिका में, कभी स्त्री मित्रों में और कभी पत्नी में। चैन फिर भी नहीं।अधूरेपन का यह अहसास उम्र भर नहीं जाता। संपूर्णता की यह तलाश अगर कभी पूरी होगी तो उसके अपने भीतर ही पूरी होगी। सही अर्थों में पुरुष के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष नहीं, अपने भीतर के स्त्रीत्व से साक्षात्कार है। जिस दिन पुरुष अपने भीतर की स्त्री को उसके तमाम प्रेम, ममत्व, कोमलता और करुणा सहित पहचान और जीवन में उतार लेगा, उस दिन उसकी तलाश स्वतः ही पूरी हो जाएगी।अपने भीतर की और दुनिया की भी समस्याओं के हल का यही एकमात्र रास्ता है। तब पृथ्वी से इतर किसी स्वर्ग की खोज नहीं करनी होगी। हिंसा, क्रूरता और निर्ममता से मुक्त यह पृथ्वी स्वयं स्वर्ग बन जाएगी।????