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March 13, 2026 6:36 pm

अपने विरोधियों को अपने बुद्धि, विवेक, धैर्य और ज्ञान की सरलता से अपना बनाना- संघ कार्य की विशेषता

सरदार श्री खुशवंत सिंह अपने जमाने के प्रमुख पत्रकारों में से रहे हैं I एक बार जब वे संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय श्री गुरुजी से मिलने गये, तब वे भारत की विख्यात साप्ताहिक पत्रिका ‘इलेस्ट्रेटेड वीकली’ के सम्पादक थे I

वे लिखते हैं कि अक्सर हम, कुछ लोगों को बिना समझे ही उनसे घृणा करने लगते हैं और इस प्रकार के लोगों में (जिनसे मैं घृणा करता था), गुरु गोलवलकर मेरी सूची में सर्वप्रथम थे I

वे आगे लिखते हैं कि मैं सोच रहा था कि गुरुजी से मिलने के लिए मुझे गणवेश धारी स्वयंसेवकों और मेरी कार का नंबर नोट करने वाले (संघ के) गुप्तचरों के घेरे से गुजरना पड़ेगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ I जहां वे (श्री गुरुजी) रुके थे, वह किसी मध्यम श्रेणी के परिवार का कमरा था और बाहर जूते और चप्पलों की कतार लगी थी I वातावरण में व्याप्त अगरबत्ती की सुगंध से ऐसा लग रहा था, मानो कमरे में पूजा हो रही हो…………….I

वे आगे लिखते हैं कि हालांकि उसी समय उनकी (श्री गुरुजी की) छाती के कर्क रोग की शल्य चिकित्सा हुई थी, फिर भी वे पूर्ण स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त दिखाई दे रहे थे I

खुशवंत सिंह लिखते हैं कि मैं यह भी सोच रहा था कि गुरु होने के कारण शिष्यवत्त चरण स्पर्श की वे मुझसे अपेक्षा कर रहे होंगे और यही सोचकर मैं उनके सामने झुका भी, लेकिन उन्होंने (गुरुजी ने) मुझे वैसा करने का अवसर ही नहीं दिया, उन्होंने मुझे खींचकर अपने निकट बिठा लिया ओर कहा “आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई I बहुत दिनों से आपसे मिलने की इच्छा थी I”

संघ के घोर विरोधी और दिल खोलकर लिखने वाले श्री खुशवंत सिंह जैसे नामी पत्रकार भी श्री गुरुजी के विराट व्यक्तित्व के सामने बात करने में संकोच कर रहे थे I वे स्वयं कहते हैं कि मैं समझ नहीं पा रहा था कि प्रारंभ कहां से करूं I मैंने (श्री गुरुजी से) कहा – “सुना है कि आप समाचारपत्रों में प्रसिद्धि को टालते हैं और आपका संगठन गुप्त है I”

इस पर श्री गुरुजी ने कहा कि यह सत्य है कि हमें प्रसिद्धि की चाह नहीं, किन्तु गुप्तता की कोई बात ही नहीं है I आप मुझसे जो चाहे पूछ सकते हैं I श्री गुरुजी ने उत्तर दिया I

जैसा कि सरदार श्री खुशवंत सिंह ने पहले स्वयं ही स्पष्ट किया कि गुरुजी की हाल ही में शल्य चिकित्सा हुई थी, और ऐसे में वे लिखते हैं कि उन्होंने श्री गुरुजी का आधा घंटे का समय ले लिया था, फिर भी उनमें (श्री गुरुजी में) किसी तरह की बेचैनी के चिन्ह नहीं दिखाई दिए और जब मैं उनसे आज्ञा लेने लगा तो उन्होंने मेरे हाथ पकड़ कर मुझे पैर छूने से रोक दिया I

पत्रकार महोदय अपने लेख में पाठकों के समक्ष अपने लिए प्रश्न भी रखते हैं कि क्या गुरुजी से मिलकर मैं (खुशवंत सिंह) प्रभावित हुआ हूं ? और फिर स्वयं ही उत्तर देते हुए कहते हैं कि हां ! मैं स्वीकार करता हूं कि श्री गुरुजी से मिलकर मैं प्रभावित हुआ हूं, लेकिन उन्होंने (श्री गुरुजी ने) मुझे अपना दृष्टिकोण स्वीकार कराने का कोई भी प्रयास नहीं किया, अपितु उन्होंने (श्री गुरुजी ने) मेरे भीतर यह भावना निर्माण कर दी कि किसी भी बात को समझने या समझाने के लिए उनका हृदय खुला हुआ है I श्री खुशवंत सिंह आगे यह भी लिखते हैं कि श्री गुरुजी ने उन्हें नागपुर आकर वस्तुस्थिति को अच्छे से समझने का निमंत्रण भी दिया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था I

(सन्दर्भ पुस्तक: – श्री गुरुजी – व्यक्तित्व एवं कृतित्व I लेखक- डॉ. कृष्ण कुमार बवेजा जी I पृष्ठ संख्या- 7 और 8) I
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नोट: –
उपरोक्त तथ्यों के प्रकटीकरण के सन्दर्भ में यहां यह उल्लेखनीय है कि अपने पूर्वाग्रहों से ग्रसित एजेंडा धारी लोग जो कभी संघ से जुड़े ही नहीं, कभी संघ शाखाओं में गए ही नहीं, वे संघ के विरुद्ध ऐसा घोर दुष्प्रचार करते हैं मानो उन सबने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऊपर सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक पीएचडी करने का एक सूत्रीय संकल्प ले रखा हो, ऐसे में उनको समझाना सिर्फ अपने समय की बरबादी करना है, लेकिन दूसरी ओर जो लोग वास्तविकताओं से अनभिज्ञ हैं या किसी हद तक ही सही, निष्पक्ष हैं, उनको सरदार खुशवंत सिंह के उक्त उदाहरण जैसे अनेक उदाहरणों से सहजता के साथ समझाने के विनम्र प्रयास अवश्य ही किये जा सकते हैं I ऐसे निरंतर प्रयास देशहित, देश भक्ति और सनातन हित के उत्कृष्ट उदाहरण हो सकते हैं I🙏🏻
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कठिन शब्दों के अर्थ: –
कर्क रोग = कैंसर की बीमारी I
शिष्यवत्त = शिष्य के समान I
गुप्तता = गुप्त रखने जैसा I
शल्य चिकित्सा = सर्जरी या ऑपरेशन I
अपितु = किंतु /बल्कि I
वस्तु स्थिति = वास्तविक स्थिति I
पूर्वाग्रह = पहले से ही निश्चित करके या सोचकर रखा गया विचार I
अनभिज्ञ = अनजान या अपरिचित।
उत्कृष्ट = श्रेष्ठ या उत्तम।