मैंने कभी नहीं सोचा था एक नौकरी के दौरान जो काम किया है उसके लिए इतना प्यार और सम्मान मिलेगा मैं आपका बहुत आभारी हूं
चंडीगढ़:पवन चोपड़ा, लगभग साढे तीन दशकों भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के तौर पर हरियाणा में सेवाएं दे रहे अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ राजशेखर वुडरू की सेवानिवृत विदाई पार्टी कार्यक्रम चंडीगढ़ के रानी लक्ष्मीबाई ऑडिटोरियम में कभी ना भूलने वाली अमिट यादगार बन गया। डॉ राजशेखर की विदाई पार्टी कार्यक्रम समाज की ओर से रखा गया था जिसमें मुख्य रूप से राज्यसभा सांसद कर्मवीर बौद्ध सहित कहीं प्रशासनिक अधिकारियों और देश की जनी-मानी हस्तियों ने शिरकत की।
इसके अलावा देश के लगभग हर राज्य ही नहीं विदेशों से भी उनके शुभचिंतकों ने निजी रूप से पहुंचकर इन पलों को कभी ना भूलने वाले अविस्मरणीय यादों के रूप में ऐतिहासिक बना दिया। इस दौरान लोगों ने जहां उनके द्वारा किए गए कार्यों की सराहना पर हर तरफ तालिया की गड़गड़ाहट हाल में गूंजती रही। वे भी इस दृश्य को देखकर भावुक नजर आए।
बर्खास्त महिला कर्मचारी को 4 साल बाद नौकरी दिला रचा इतिहास
कार्यक्रम के दौरान बताया गया कि जब एक महिला बाल विकास विभाग की कर्मचारी को दूसरे बच्चे के दौरान मातृत्व अवकाश नहीं दिया गया। इस दौरान में ड्यूटी पर नहीं पहुंच सकी और उन्हें सेवा से निष्कासित कर दिया गया। 4 वर्षों तक हुए यहां वहां धक्के खाती रही । लेकिन किसी भी अधिकारी ने उसकी सुध नही ली। लेकिन जैसे ही वे राजशेखर के पास फरियाद लेकर पहुंची ।उन्होंने नौकरी ही नही पूरे 4 साल के सभी सरकारी लाभ वापस दिलाए। बल्कि उसके बाद भी उन्हें मातृत्व अवकाश भी दिलवाया।
जब बाढ़ में बकरियों को उठाया कंधे पर
आमतौर पर जहां प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर सेवाएं दे रहे अधिकारी अपने पद का रुआब दिखाने और खुद को दुनिया से अलग दिखने की कोशिश करते हैं। लेकिन जब महेंद्रगढ़ में एसडीएम रहते हुए वहां पर बाढ़ आई तो तुरंत प्रभाव मौके पर पहुंचकर बिना किसी झिझक के अन्य लोगों के साथ वहां के किसानों की भेड़ बकरियों को खुद भी कंधे पर उठाकर पानी से बाहर निकलते नजर आए। इसके अलावा उन्हीं की सोच का नतीजा है कि आज महेंद्रगढ़ में जो बाजार बना है उसकी कल्पना भी राजशेखर की सोच का नतीजा है। जिसकी बदौलत आज वहां पर लगभग 500 दुकान ने बनी हुई है और उनके 1000 के आसपास मालिक है। जिसमें 500 महिलाएं और लगभग 2000 के आसपास पुरुष भी कार्य कर रहे हैं जो कि क्षेत्र के लिए एक बहुत बड़ा व्यापार का केंद्र बन गया है।
संयुक्त राष्ट्र संघ में दलितों के अधिकारों के लेकर व्याख्यान देने वाले पहले आईएएस अधिकारी बने
समाज में एकता समानता और उत्थान की सोच रखने वाले डॉक्टर राजशेखर द्वारा गांधी पटेल और अंबेडकर पर लिखी की किताब ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपना व्याख्यान दिया। इसके अलावा अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में भी उन्होंने अपना व्याख्यान देकर राष्ट्रीय नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
इसके अलावा अन्य कहीं ऐसे कार्य किए जो कि उनके अधिकार क्षेत्र ही नहीं कल्पना से भी परे थे।
मैने कभी नही सोचा था एक नौकरी के दौरान जो काम किया उसके लिया इतना प्यार और सम्मान बहुत आभारी हूँ
मैं अपनी माता राजेश्वरी के अलावा परिवार की तरफ से आप सबका बहुत आभारी हूं।
पहले मैने मना किया था आखिरकार मैने हां कही उसका फलस्वरूप हैं। ये प्यार आल ओवर इंडिया से आये हर राज्य से आप कितनी बड़ी संख्या में आए हैं। उन्होंने कहा कि
इतने लंबे सफ़र मे बहुत यादें होती चाहे विद्यार्थी जीवन हो हम सब आगे बढ़ते हैं जब आपका लक्ष्य आपका उद्देश्य आपकी आईडियोलॉजी ,सामाजिक न्याय समानता में ध्यान रखते हैं। तो मुझे प्रतीत हुआ आपके साथ बहुत लोग जुड़ेंगे आज के दिन सार्थक हो रहा है जिससे हम यात्रा में चलते हैं हैदराबाद से जवाहरलाल यूनिवर्सिटी दिल्ली
जहां ओपन माइंड से बात होती है।
*संयोग ही कहा जाएगा हरियाणा गठन भी 1966 में और इनका जन्म भी 1966*
कार्यक्रम के दौरान उनके जीवन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी दिखाई गई। जिसमें उनके जीवन को लेकर तमाम पहलुओं को दर्शाया गया। जहां सबसे पहले उन्होंने अपने गृह प्रदेश आंध्र प्रदेश में प्रशासनिक सेवा अधिकारी के रूप में काम किया फिर उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा में ज्वाइन किया ।लेकिन उनकी प्रशासनिक यात्रा शायद उन्हें कहीं और ले जाना चाहती थी। उसके बाद उन्होंने फिर से यूपीएससी की परीक्षा पास की और आईएएस अधिकारी के तौर पर हरियाणा कैडर चुना। डॉ राजशेखर आईएएस अधिकारियों में से एक है जिन्होंने अपने ऑफिस में आए किसी भी व्यक्ति को कभी निराश नहीं लौटाया।इसके अलावा समाज के दबे कुचले और अंतिम व्यक्ति के लिए हमेशा ही लीक से हटकर काम करने की कोशिश की। उनकी इसी सेवा का प्रतिफल है कि चंडीगढ़ रानी लक्ष्मीबाई ऑडिटोरियम में उन्हें बधाई देने वालों का तांता इस कदर लगा था कि वहां तिल रखने की जगह नहीं थी। उसके साथ के सामुदायिक केंद्र में भी एलईडी स्क्रीन पर लोगों को कार्यक्रम देखना पड़ा





