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October 14, 2026 6:54 pm

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विश्वविद्यालय की स्वायत्तता से कोई समझौता नहीं, प्रस्तावित बिल के हर प्रावधान का हो गहन अध्ययन: HPUTWA

विश्वविद्यालय की अकादमिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए व्यापक संवाद और जन-जागरूकता अभियान चलाने पर दिया जोर

शिमला,14 अक्टूबर 2026, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और अकादमिक स्वतंत्रता की रक्षा को लेकर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ (HPUTWA) के आह्वान पर चल रहा शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक आंदोलन लगातार जारी है। बुधवार को आयोजित धरना-प्रदर्शन में डॉ. जसवीर, डॉ. दीप लता, डॉ. अशोक बंसल, डॉ. विनोद नेगी, डॉ. सुनील, HPUTWA की संयुक्त सचिव डॉ. अंजली शर्मा तथा सचिव डॉ. अंकुश भारद्वाज ने अपने विचार रखे और विश्वविद्यालय की संस्थागत एवं अकादमिक स्वायत्तता की रक्षा की आवश्यकता पर बल दिया।
वक्ताओं ने कहा कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि उसकी शैक्षणिक पहचान, स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता और संस्थागत गरिमा का आधार है। विश्वविद्यालय की स्थापित वैधानिक व्यवस्था में प्रस्तावित किसी भी बदलाव का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि उसका विश्वविद्यालय की अकादमिक स्वतंत्रता, शोध, नवाचार और प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
प्रस्तावित बिल का विस्तृत अध्ययन और तथ्यात्मक विश्लेषण आवश्यक
वक्ताओं ने कहा कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता से संबंधित प्रस्तावित बिल की प्रति प्राप्त कर उसके प्रत्येक प्रावधान का गंभीरता से अध्ययन किया जाना आवश्यक है। इसके आधार पर विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाए, ताकि इस महत्वपूर्ण विषय पर स्पष्ट और प्रामाणिक जानकारी विश्वविद्यालय समुदाय तथा आम जनता के समक्ष रखी जा सके।
उन्होंने कहा कि स्वायत्तता का वास्तविक अर्थ, उसका वैधानिक महत्व तथा विश्वविद्यालय की निर्णय लेने की स्वतंत्रता से उसका संबंध सभी संबंधित लोगों को समझाया जाना चाहिए।
डॉ. जसवीर ने विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की पहचान उसकी स्वतंत्र शैक्षणिक व्यवस्था और संस्थागत निर्णय लेने की क्षमता से होती है। किसी भी प्रस्तावित बदलाव से पहले उसके दूरगामी प्रभावों पर गंभीर विचार-विमर्श आवश्यक है।
डॉ. दीप लता ने व्यापक सहभागिता और संवाद की आवश्यकता पर बल दिया।** उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता से जुड़ा विषय केवल वर्तमान शिक्षकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों, सेवानिवृत्त शिक्षकों, कर्मचारियों तथा विद्यार्थियों के प्रतिनिधियों को भी इस संवाद का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
डॉ. अशोक बंसल ने कहा कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता उसकी अकादमिक उत्कृष्टता का आधार है।उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में शोध, नवाचार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए स्वतंत्र निर्णय लेने की व्यवस्था आवश्यक है। विश्वविद्यालय की समस्याओं का समाधान उसकी संस्थागत स्वतंत्रता को सीमित करने के बजाय उसकी शैक्षणिक और प्रशासनिक क्षमताओं को मजबूत करके किया जाना चाहिए।
डॉ. विनोद नेगी ने प्रस्तावित प्रावधानों के तथ्यात्मक अध्ययन पर जोर दिया।** उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता से संबंधित किसी भी प्रस्तावित बदलाव के प्रत्येक पहलू को समझना आवश्यक है। तथ्यों और स्थापित वैधानिक प्रावधानों के आधार पर ही इस विषय को प्रभावी ढंग से विश्वविद्यालय समुदाय तथा समाज के समक्ष रखा जा सकता है।
डॉ. सुनील ने विश्वविद्यालय समुदाय की एकजुटता को आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बताया।** उन्होंने कहा कि शिक्षकों की लगातार सहभागिता इस बात का प्रमाण है कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को लेकर सभी गंभीर हैं। उन्होंने अधिक से अधिक शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा अन्य संबंधित लोगों को इस अभियान से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।HPUTWA की संयुक्त सचिव डॉ. अंजली शर्मा ने कहा कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता केवल वर्तमान पीढ़ी का मुद्दा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के शैक्षणिक भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता उसकी नींव है और अकादमिक स्वतंत्रता उसके मजबूत स्तंभ हैं। यदि विश्वविद्यालय की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है, तो इसका असर शिक्षा, शोध और नवाचार पर भी पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि इस महत्वपूर्ण विषय पर विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों, सेवानिवृत्त शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों के प्रतिनिधियों को साथ लेकर व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए।
डॉ. अंजली शर्मा ने कहा, “विश्वविद्यालय की स्वायत्तता केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि उसकी पहचान, गरिमा और अकादमिक स्वतंत्रता की नींव है। आज हमारी एकजुट आवाज केवल वर्तमान की लड़ाई नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के शैक्षणिक भविष्य की रक्षा का संकल्प है।
HPUTWA के सचिव डॉ. अंकुश भारद्वाज ने आंदोलन को और अधिक व्यापक तथा संगठित बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।** उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता से जुड़े मुद्दों पर विभिन्न वर्गों के बीच निरंतर संवाद आवश्यक है। अन्य विश्वविद्यालयों, पूर्व छात्रों, सेवानिवृत्त शिक्षकों तथा विद्यार्थियों के प्रतिनिधियों को साथ लेकर इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक माध्यमों से लगातार आवाज उठाई जाती रहेगी।
व्यापक संवाद और जन-जागरूकता पर जोर
HPUTWA ने विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के विषय पर व्यापक संवाद की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों, सेवानिवृत्त शिक्षकों, गैर-शिक्षक कर्मचारियों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के प्रतिनिधियों की सहभागिता महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही निष्पक्ष एवं तटस्थ शिक्षाविदों को भी संवाद में शामिल करने की आवश्यकता व्यक्त की गई।
संघ ने अन्य विश्वविद्यालयों के साथ समन्वय स्थापित कर विश्वविद्यालयों की संस्थागत स्वायत्तता से जुड़े विषयों पर संयुक्त विचार-विमर्श की संभावनाओं पर भी जोर दिया।
HPUTWA ने कहा कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता से संबंधित विषयों को तथ्यात्मक और स्पष्ट रूप से सार्वजनिक मंचों तथा मीडिया के माध्यम से सामने लाया जाना चाहिए, ताकि समाज का प्रत्येक वर्ग इस मुद्दे की गंभीरता को समझ सके।
संघ ने प्रदेश सरकार से आग्रह किया कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को प्रभावित करने वाले प्रस्तावित प्रावधानों पर पुनर्विचार किया जाए तथा विश्वविद्यालय की स्थापित वैधानिक व्यवस्था, संस्थागत गरिमा और अकादमिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखा जाए।
HPUTWA ने दोहराया कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की रक्षा के लिए चल रहा आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और विश्वविद्यालय के व्यापक हितों के प्रति समर्पित है। संघ ने सभी शिक्षकों और विश्वविद्यालय समुदाय से इस अभियान में अपनी सक्रिय सहभागिता बनाए रखने का आह्वान किया।
विश्वविद्यालय की स्वायत्तता हमारी पहचान है, अकादमिक स्वतंत्रता हमारा अधिकार है और इसकी रक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ (HPUTWA)** 
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला