कांगड़ा जिले की 10 पंचायतों में 302 लोगों पर किए गए अध्ययन में सामने आई महिलाओं के भूमि अधिकारों की वास्तविक स्थिति
शिमला, 31 अक्टूबर।पर्वतीय महिला विकास ट्रस्ट (PMVT) की ओर से शनिवार को शिमला के सांगटी स्थित एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव स्टाफ ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (ACSTI) में महिलाओं के भूमि एवं संपत्ति अधिकारों को लेकर एक दिवसीय राज्य स्तरीय बैठक आयोजित की गई। बैठक का उद्देश्य महिलाओं के भूमि अधिकारों की वर्तमान स्थिति पर चर्चा करना, इस दिशा में आ रही चुनौतियों को समझना और महिलाओं को जमीन एवं संपत्ति में बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए आगे की कार्ययोजना तैयार करना था।
बैठक में हिमाचल प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष विद्या नेगी ने ऑनलाइन माध्यम से मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की और प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि कानूनी अधिकार होने के बावजूद व्यवहार में महिलाओं को उनके अधिकारों का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं जीवनभर परिवार, खेती और घर की देखभाल करती हैं, लेकिन भूमि एवं संपत्ति में उनका अधिकार सुनिश्चित नहीं हो पाता। उन्होंने इस स्थिति में बदलाव लाने के लिए सामाजिक सोच में परिवर्तन और महिलाओं को वास्तविक अधिकार दिलाने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि महिलाओं का सशक्तिकरण केवल योजनाओं और जागरूकता तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें जमीन और संपत्ति में प्रत्यक्ष अधिकार मिलना जरूरी है। उन्होंने राजस्व विभाग से सटीक आंकड़े जुटाने, विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर कार्य करने तथा पंचायत स्तर पर जागरूकता बढ़ाने का आह्वान किया।
कांगड़ा जिले में किए गए अध्ययन में सामने आए महत्वपूर्ण तथ्य
बैठक के दौरान पर्वतीय महिला विकास ट्रस्ट की ओर से कांगड़ा जिले की 10 पंचायतों में महिलाओं के भूमि एवं संपत्ति अधिकारों को लेकर किए गए शोध की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। इस अध्ययन में कुल 302 लोगों को शामिल किया गया, जिनमें 73 प्रतिशत महिलाएं थीं।
अध्ययन के अनुसार 76 प्रतिशत मकान पुरुषों के नाम पर हैं, जबकि केवल 18 प्रतिशत महिलाओं के नाम पर संपत्ति दर्ज है। परिवार की संपत्ति में बेटियों की हिस्सेदारी मात्र एक प्रतिशत पाई गई। वहीं, 32 प्रतिशत प्रतिभागियों ने बेटों को पैतृक संपत्ति का प्राथमिक उत्तराधिकारी माना।
शोध में यह भी सामने आया कि 67 प्रतिशत प्रतिभागियों को जमीन से जुड़े दस्तावेज समझने में कठिनाई होती है और 96 प्रतिशत महिलाओं ने कभी भूमि अधिकारों से संबंधित जागरूकता शिविर में भाग नहीं लिया। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत दर्ज लाभार्थियों में 175 पुरुषों की तुलना में केवल 27 महिलाएं थीं।
अध्ययन में प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव भी सामने आया। 44 लोगों ने भूस्खलन का सामना किया, 43 ने खेती छोड़ दी और 26 परिवारों ने अपना मकान या जमीन खो दी। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि महिलाओं के भूमि अधिकार केवल कानूनी विषय नहीं,बल्कि उनकी आर्थिक सुरक्षा, सम्मान,पहचान और आत्मनिर्भरता से भी जुड़े हैं।
महिलाओं के भूमि अधिकारों पर मिलकर काम करने की जरूरत
बैठक में शोध के प्रमुख निष्कर्षों के साथ जून 2026 में आयोजित राज्य स्तरीय बैठक में मिले सुझावों और अब तक हुई चर्चाओं की जानकारी भी साझा की गई। इस दौरान महिलाओं को भूमि दस्तावेज समझने में सहायता देने, कानूनी जानकारी उपलब्ध करवाने, विधवा एवं एकल महिलाओं के अधिकारों पर विशेष ध्यान देने तथा बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर चर्चा हुई।
पर्वतीय महिला विकास ट्रस्ट की विमला विश्वप्रेमी ने भी प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जमीन और संपत्ति में बराबरी का हिस्सा महिलाओं की कोई मांग नहीं, बल्कि उनका अधिकार है। महिलाएं परिवार, खेती और समाज को आगे बढ़ाने में बराबर की भूमिका निभाती हैं, लेकिन जब जमीन और संपत्ति पर अधिकार की बात आती है तो उन्हें आज भी अपने हिस्से के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि महिलाओं के भूमि अधिकार केवल कानून और कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उन्हें व्यवहार में भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके लिए सामाजिक संगठनों, समुदायों, पंचायतों और सरकारी विभागों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों ने साझा किए विचार
राज्य स्तरीय बैठक के दौरान आयोजित पैनल चर्चा में विभिन्न विशेषज्ञों, कानूनविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने महिलाओं के भूमि अधिकारों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार साझा किए। कलावती ने युवाओं में जागरूकता फैलाने और पितृसत्तात्मक सोच में बदलाव लाने पर जोर दिया। यशपाल शर्मा ने कानूनी अधिकारों के क्रियान्वयन और महिला आयोग की सक्रिय भूमिका को रेखांकित किया। संध्या गौतम ने जमीन से जुड़े कानूनी दस्तावेजों को सरल बनाने और संवाद प्रक्रिया मजबूत करने की आवश्यकता बताई, जबकि मीनाक्षी ने आंकड़ों के आधार पर भूमि के वास्तविक उपयोग और सामाजिक बदलाव पर ध्यान केंद्रित किया।
सतीश ने भूमि सुधारों, भूमिहीन परिवारों की समस्याओं और नीतिगत पैरवी के महत्व को रेखांकित किया। अधिवक्ता आदर्श ने घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के लिए स्वतंत्र आवास और आर्थिक सुरक्षा को अनिवार्य बताया। वहीं, कोंडल ने पंचायत स्तर पर महिला भूमि अधिकार सहायता समितियों के गठन तथा प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र विकसित करने का सुझाव दिया।
बैठक में SRDA, मंडी एकल नारी शक्ति संगठन, NCDHR, जन हक मंच, SEHER (दिल्ली), सेंटर फॉर स्टडी ऑफ राइट्स, दिव्य हिमाचल, ग्रीन हब और दलित दस्तान विरोधी आंदोलन सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।
कार्यक्रम के अंत में महिलाओं के भूमि एवं संपत्ति अधिकारों को मजबूत बनाने के लिए साझा प्रयास करने, जागरूकता बढ़ाने और संबंधित विभागों के साथ समन्वय स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की गई।






