सबकी खबर , पैनी नज़र

October 31, 2026 7:26 pm

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हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ पिछले छप्पन दिन से लगातार प्रदेश के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की प्रमोशन तथा विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता बहाल करने हेतु आंदोलनरत हैं।

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ पिछले छप्पन दिन से लगातार प्रदेश के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की प्रमोशन तथा विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता बहाल करने हेतु आंदोलनरत हैं ।
हिमाचल प्रदेश के विश्वविद्यालयों ने जहाँ कृषि, वानिकी, बागवानी जैसे दैनिक जीवन से जुड़े क्षेत्रों में इस प्रदेश के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई, वहीं शिमला में स्थित प्रदेश के सबसे पुराने विश्वविद्यालय ने पिछले साढ़े पाँच दशकों से प्रदेश की जनता को विज्ञान, कला, विधि, गणित, भाषा, चिकित्सा, प्रशासन और राजनीति जैसे अनेक विषयों में बेहतरीन उच्च शिक्षा प्रदान की है।
आज प्रदेश के न्यायालयों, चिकित्सालयों, महाविद्यालयों और प्रशासनिक विभागों से लेकर व्यापार तथा कृषि से जुड़े किसी भी व्यक्ति से पूछ लीजिए, वह इन्हीं विश्वविद्यालयों से पढ़ा हुआ मिलेगा। इन विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध और नवाचार के पीछे सबसे बड़ी शक्ति थी—विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) द्वारा प्रदान की गई स्वायत्तता। इसे हम राजनीतिक हस्तक्षेप से इतर, विधि के अनुसार अपने बौद्धिक बल पर संचालित संस्थानों के रूप में भी समझ सकते हैं।
लेकिन दुर्भाग्य से, 2 सितंबर को वर्तमान प्रदेश सरकार हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक, 2026 लेकर आती है, जिसके माध्यम से वर्षों से स्थापित विश्वविद्यालयों के अधिनियमों में संशोधन किया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, 1970 में बने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम में यह कहते हुए संशोधन किया गया कि – “ वित्तीय कुप्रबंधन के मामले सरकार के संज्ञान में आए हैं और सरकार शिक्षण एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती में निष्पक्षता लाना चाहती है।“
इसका उपाय सरकार ने यह निकाला है कि कार्यकारी परिषद् और कुलपति की शक्तियाँ समाप्त करके वित्त सचिव को सौंप दी जाएँ तथा नियुक्तियाँ प्रदेश के लोक सेवा आयोग और राज्य चयन आयोग के माध्यम से की जाएँ। जबकि पूरे देश में विश्वविद्यालयों की वित्त समिति के अध्यक्ष कुलपति होते हैं और यू.जी.सी. के मानकों के आधार पर महामहिम राज्यपाल द्वारा गठित चयन समितियाँ शिक्षकों की भर्तियाँ करती हैं।
विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति सरकार करती है, प्रति-कुलपति की नियुक्ति सरकार करती है, कार्यकारी परिषद् के प्रतिनिधियों की नियुक्ति सरकार करती है। रजिस्ट्रार, वित्त अधिकारी और संयुक्त नियंत्रक की नियुक्तियाँ भी सरकार करती है। ऑडिट का सारा नियंत्रण भी सरकार के पास है। क्यूंकि जब यहाँ सारे उच्च अधिकारी और सर्वोच्च संस्था कार्यकारी परिषद् के नुमायंदे सरकार के लगाए हैं तो अनिमियतता कैसे हो गई? ऐसे में, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता से सरकार का डरना कई प्रश्न खड़े करता है और यह आशंका उत्पन्न करता है कि शायद सरकार उच्च शिक्षा के प्रति अत्यंत लापरवाह है।
हमें लगता है कि ऐसी व्यवस्था प्रदेश में उच्च शिक्षा को ध्वस्त कर देगी। इससे शोध और नवाचार का वह वातावरण भी समाप्त हो जाएगा, जिसमें एक शोधकर्ता चौबीस घंटे तक अपनी प्रयोगशाला में बिना थके किसी घातक बीमारी की नई दवा बनाने, किसी खगोलीय घटना की प्रक्रिया को समझने, खेती की नई तकनीकों को विकसित करने या फिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को राष्ट्रहित में ढालने में लगा रहता है। इस व्यवस्था के माध्यम से शोधकर्ताओं को सरकारी दफ्तरों की तरह दस से पाँच बजे तक काम करने वाला कर्मचारी बना दिया जाएगा और बौद्धिक विकास की सभी संभावनाओं पर पूर्णविराम लग जाएगा।
इसलिए, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय अध्यापक संघ पिछले पचपन दिनों से धरना-प्रदर्शन करके सरकार से निवेदन कर रहा है कि वह संशोधन विधेयक को रोककर शिक्षकों के साथ चर्चा करे। लेकिन सरकार ने इस पर संज्ञान लेने के बजाय इसे माननीय राज्यपाल, जो सभी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी हैं, की संस्तुति के लिए भेज दिया है।
इसके विरोध में प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों के शिक्षक, गैर-शिक्षक कर्मचारी, शोधार्थी और पूर्व छात्र 5 नवंबर को सुबह 11 बजे विश्वविद्यालय के सभागार में एकत्रित होकर चर्चा करेंगे और आगे के आंदोलन की रणनीति बनाएँगे। पचपन दिनों की निरंतर चर्चा के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस विधेयक से प्रदेश में उच्च शिक्षा और उसके केंद्रों के अस्तित्व पर संकट आ जाएगा।
शिक्षा, शोध और नवाचार को सरकारी लाठी से हाँका नहीं जा सकता। न ही प्रदेश के जागरूक और शिक्षित समाज को ऐसा करने का हक़ किसी सरकार को देना चाहिए ।
आपसे निवेदन है कि 5 नवंबर को शिमला के समरहिल स्थित विश्वविद्यालय के सभागार में आकर प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों को बचाने में अपना सहयोग दें। हम किसी राजनीतिक पार्टी या सरकार के विरुद्ध नहीं हैं। हम यह भी जानते हैं कि माननीय मुख्यमंत्री से लेकर अनेक मंत्री और विपक्ष में बैठने वाले कई विधायक हमारे ही विश्वविद्यालयों के पूर्व छात्र हैं।
हम केवल विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के पक्ष में हैं, ताकि इस प्रदेश का विद्यार्थी ठीक वैसी ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सके, जैसी उसके पूर्व की पीढ़ियों को प्राप्त हुई थी और जो उसका संवैधानिक अधिकार है।
सरकार  उच्च शिक्षण संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों के हित में CAS प्रमोशन एवं विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को बहाल करे ।
जारी कर्ता
डॉ नितिन व्यास              डॉ अंकुश
अध्यक्ष।                        महासचिव

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ पिछले छप्पन दिन से लगातार प्रदेश के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की प्रमोशन तथा विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता बहाल करने हेतु आंदोलनरत हैं।