भारतीय ज्ञान परंपराओं और आधुनिक तकनीक के समन्वय से नैतिक, समावेशी एवं मानवीय भविष्य के निर्माण पर जोर
शिमला, 29 अक्टूबर 2026। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला में आज ‘Indian Knowledge System and Artificial Intelligence: Integrating Indigenous Wisdom with Emerging Technologies’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। 29 एवं 30 अक्टूबर को आयोजित इस संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय ज्ञान प्रणालियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के अंतर्संबंधों का बहुविषयक दृष्टिकोण से अध्ययन करना तथा समकालीन तकनीकी विकास में भारतीय दार्शनिक, नैतिक, भाषायी, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक परंपराओं की प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श करना है।
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में बेनेट विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति प्रो. (डॉ.) राज सिंह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), पटना की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रियंका त्रिपाठी ने ऑनलाइन माध्यम से मुख्य वक्तव्य प्रस्तुत किया। बेनेट विश्वविद्यालय के टाइम्स स्कूल ऑफ मीडिया के डीन एवं संगोष्ठी के संयोजक डॉ. सुमित नरूला ने विषय-परिचय दिया, वहीं, डॉ. राजीव कुमार मिश्रा, लाइब्रेरियन एवं प्रभारी (एआरओ), भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं एवं प्रतिभागियों का हार्दिक स्वागत किया। उनके संबोधन ने संगोष्ठी के अकादमिक विमर्श की पृष्ठभूमि तैयार की तथा भारतीय ज्ञान परंपराओं और उभरती प्रौद्योगिकियों के बीच सार्थक बौद्धिक संवाद को प्रोत्साहित करने के महत्त्व को रेखांकित किया।
उद्घाटन सत्र में प्रो. सचिदानंद मोहंती को श्रद्धांजलि
संगोष्ठी के औपचारिक शुभारंभ से पूर्व भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के राष्ट्रीय फेलो प्रो. सचिदानंद मोहंती के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उपस्थित विद्वानों, अतिथियों और प्रतिभागियों ने दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रो. मोहंती का 27 अक्टूबर 2026 को निधन हो गया था।
प्रो. मोहंती अंग्रेजी एवं ओड़िया साहित्य, साहित्यिक आलोचना, यात्रा-वृत्तांत और सांस्कृतिक इतिहास के प्रतिष्ठित विद्वान थे। उन्होंने अपने दीर्घ अकादमिक जीवन में केंद्रीय विश्वविद्यालय, ओडिशा के कुलपति सहित अनेक महत्त्वपूर्ण शैक्षणिक दायित्वों का निर्वहन किया। उनकी 29 पुस्तकों तथा साहित्यिक शोध ने भारतीय साहित्य और संस्कृति के अध्ययन को समृद्ध किया। वे श्री अरविंद के प्रमुख अध्येताओं में भी गिने जाते थे। संस्थान ने उनके निधन को अकादमिक एवं बौद्धिक जगत की अपूरणीय क्षति बताते हुए उनके विद्वत्तापूर्ण योगदान और बौद्धिक विरासत के प्रति सम्मान व्यक्त किया।
संगोष्ठी के संयोजक ने प्रस्तुत किया विषय का व्यापक परिप्रेक्ष्य*
उद्घाटन सत्र में संगोष्ठी के संयोजक एवं बेनेट विश्वविद्यालय के टाइम्स स्कूल ऑफ मीडिया के डीन डॉ. सुमित नरूला ने संगोष्ठी की विषयवस्तु और उसके प्रमुख उद्देश्यों का परिचय दिया। उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणालियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बीच संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए इस विषय के बहुविषयक महत्त्व को सामने रखा।
संगोष्ठी की विषयवस्तु भारतीय दर्शन, भाषायी परंपराओं, स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान, पर्यावरणीय अनुभवों तथा कला एवं सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक तकनीकी विकास के साथ जोड़कर देखने पर केंद्रित है। इस संदर्भ में यह विमर्श महत्त्वपूर्ण है कि भारतीय ज्ञान परंपराओं में निहित नैतिक मूल्यों और जीवन-दृष्टि का उपयोग कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उत्तरदायी, समावेशी एवं समाजोन्मुख विकास के लिए किस प्रकार किया जा सकता है।
डॉ. प्रियंका त्रिपाठी का मुख्य वक्तव्य: एआई के विकास में नैतिकता और मानवीय मूल्यों का महत्त्व*
आईआईटी पटना की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रियंका त्रिपाठी ने ऑनलाइन माध्यम से मुख्य वक्तव्य प्रस्तुत किया। उनके वक्तव्य ने संगोष्ठी की केंद्रीय विषयवस्तु के अंतर्गत भारतीय ज्ञान प्रणालियों और उभरती प्रौद्योगिकियों के परस्पर संबंधों पर अकादमिक विमर्श के लिए आधार प्रदान किया।
संगोष्ठी के व्यापक संदर्भ में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती भूमिका के साथ यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि तकनीकी प्रगति को नैतिक उत्तरदायित्व, मानवीय संवेदनशीलता और सामाजिक कल्याण से किस प्रकार जोड़ा जाए। एल्गोरिद्मिक पक्षपात, पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीक तक समान पहुँच जैसे प्रश्न एआई के उपयोग पर गंभीर विचार की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
भारतीय ज्ञान प्रणालियों में निहित विविध दार्शनिक एवं नैतिक दृष्टिकोण इन प्रश्नों पर विचार करने के लिए उपयोगी बौद्धिक आधार प्रदान कर सकते हैं। ऑनलाइन माध्यम से वक्तव्य प्रस्तुत करने के लिए डॉ. त्रिपाठी के प्रति आभार व्यक्त किया गया।
मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) राज सिंह ने अकादमिक संवाद और अंतर्विषयक दृष्टिकोण के महत्त्व को रेखांकित किया
बेनेट विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति एवं संगोष्ठी के मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) राज सिंह ने अपने संबोधन में इस महत्त्वपूर्ण अकादमिक आयोजन में सहभागिता की। उनके संबोधन ने भारतीय ज्ञान प्रणालियों और आधुनिक तकनीकी विकास के बीच संबंधों पर विचार-विमर्श के लिए उद्घाटन सत्र को आगे बढ़ाया।
संगोष्ठी की विषयवस्तु विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के समक्ष एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न प्रस्तुत करती है—तकनीकी नवाचार को भारतीय ज्ञान परंपराओं, नैतिक मूल्यों और सामाजिक आवश्यकताओं के साथ किस प्रकार जोड़ा जाए। शिक्षा, अनुसंधान, भाषा, पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत जैसे क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की संभावनाओं पर विचार करने के लिए अंतर्विषयक दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।
डॉ. अखिलेश पाठक ने किया उद्घाटन सत्र का संचालन और प्रस्तुत किया धन्यवाद ज्ञापन
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के सेल्स एवं जनसंपर्क अधिकारी डॉ. अखिलेश पाठक ने उद्घाटन सत्र का संचालन करते हुए कार्यक्रम के विभिन्न चरणों को सुव्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ाया। उन्होंने अतिथियों, वक्ताओं, विद्वानों और प्रतिभागियों का स्वागत किया तथा संगोष्ठी की विषयवस्तु के अनुरूप उद्घाटन सत्र के विभिन्न वक्तव्यों के बीच समन्वय स्थापित किया।
मुख्य अतिथि के संबोधन के पश्चात डॉ. पाठक ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) राज सिंह, मुख्य वक्ता डॉ. प्रियंका त्रिपाठी, संगोष्ठी के संयोजक डॉ. सुमित नरूला तथा स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत करने वाले डॉ. राजीव कुमार मिश्रा के प्रति आभार व्यक्त किया।
उन्होंने भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी के नेतृत्व, मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन के लिए भी संस्थान की ओर से धन्यवाद व्यक्त किया। उन्होंने संगोष्ठी के आयोजन में योगदान देने वाले विद्वानों, शोधार्थियों, प्रतिभागियों, प्रशासनिक कर्मियों और तकनीकी सहयोगियों के प्रति भी आभार प्रकट किया।
पर्यावरणीय स्थिरता, सांस्कृतिक विरासत और एआई नैतिकता पर पहले दिन अकादमिक विमर्श*
उद्घाटन सत्र के बाद संगोष्ठी के पहले दिन तीन अकादमिक सत्र आयोजित किए गए, जिनमें पर्यावरणीय स्थिरता, कला एवं सांस्कृतिक विरासत तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श हुआ।
प्रथम सत्र: स्वदेशी पर्यावरणीय ज्ञान और सतत विकास के लिए एआई*
डॉ. सुमित नरूला की अध्यक्षता में आयोजित प्रथम सत्र में पर्यावरणीय नैतिकता, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व तथा भारतीय ज्ञान प्रणालियों की समकालीन प्रासंगिकता पर चर्चा हुई। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स की डॉ. लता सुरेश ने ‘Sustainability, Environmental Ethics and Coexistence with Nature’ विषय पर प्रस्तुति दी। आईआईएम शिलांग की प्रोफेसर डॉ. नीलम रानी ने भारतीय ज्ञान प्रणालियों और कौटिल्य के अर्थशास्त्र के संबंध पर व्याख्यान दिया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज फॉर विमेन के डॉ. संजीव कुमार ने गांधीवादी न्यासिता तथा अद्वैत वेदांत में ‘स्वामित्वहीनता’ की अवधारणा के संदर्भ में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वामित्व के प्रश्न पर विचार प्रस्तुत किए।
द्वितीय सत्र: कला, संस्कृति, विरासत और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका
डॉ. अन्वेषा शर्मा की अध्यक्षता में आयोजित दूसरे सत्र में भारतीय कला, पांडुलिपियों, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की संभावनाओं तथा उससे जुड़े नैतिक प्रश्नों पर चर्चा हुई।
ऋषिहुड विश्वविद्यालय, सोनीपत के श्री क्षितिज आनंद ने सांस्कृतिक विरासत के डिजिटल अभिलेखीकरण, पुनर्स्थापन और आभासी पुनर्निर्माण पर प्रस्तुति दी। एमिटी विश्वविद्यालय राजस्थान की प्रोफेसर एवं एमिटी लॉ स्कूल की निदेशक डॉ. कोमल औदिच्य ने पांडुलिपियों, ताड़पत्र ग्रंथों, हस्तशिल्प और दृश्य परंपराओं के संरक्षण में एआई की भूमिका पर ऑनलाइन व्याख्यान दिया।
केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब की सुश्री प्रांजलि सिंह ने सांस्कृतिक विरासत में एआई के नैतिक उपयोग और भारतीय ज्ञान प्रणालियों के संदर्भ में सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया। किशनगंज, बिहार के अकादमिक शोधकर्ता श्री ज़ैनुल आबिदीन ने बदलती रचनात्मक अर्थव्यवस्था में पारंपरिक कलाकारों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जुड़े प्रश्नों पर अपनी प्रस्तुति दी।
तृतीय सत्र: एआई के प्रति नैतिक और धर्म-आधारित दृष्टिकोण*
दिन के तीसरे सत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नैतिक पक्षों तथा भारतीय दार्शनिक परंपराओं की प्रासंगिकता पर विमर्श हुआ। टाइम्स स्कूल ऑफ मीडिया, बेनेट विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. तिलक झा की अध्यक्षता में आयोजित इस सत्र में धर्म, अहिंसा, लोकसंग्रह और विवेक जैसी अवधारणाओं के माध्यम से उत्तरदायी एआई की संभावनाओं का अध्ययन किया गया।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स ऑफ आईसीएआई के श्री सिद्धेश्वर शुक्ल ने इन भारतीय नैतिक अवधारणाओं को एआई नैतिकता के ढाँचे के रूप में समझने पर ऑनलाइन व्याख्यान दिया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रामनाथ झा ने वेदांत, बौद्ध, जैन, न्याय और सांख्य दर्शन के आलोक में एल्गोरिद्मिक पक्षपात, निष्पक्षता और जवाबदेही के प्रश्नों का विश्लेषण किया।
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के शोधार्थी श्री जयदेव सिंह ने धर्म, विवेक और एल्गोरिद्मिक पक्षपात के संदर्भ में उत्तरदायी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए भारतीय ज्ञान प्रणाली आधारित ढाँचे पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया। हल्दिया गवर्नमेंट कॉलेज, पश्चिम बंगाल के डॉ. निजामुद्दीन अहमद ने भारतीय ज्ञान प्रणालियों के माध्यम से नैतिक एआई की पुनर्कल्पना पर अपनी प्रस्तुति दी।
दूसरे दिन स्वास्थ्य, भाषायी प्रौद्योगिकी और शिक्षा नीति पर चर्चा
संगोष्ठी के दूसरे दिन, 30 अक्टूबर को, आयुर्वेद, योग एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से स्वास्थ्य और कल्याण; भारतीय भाषायी परंपराओं एवं भाषा प्रौद्योगिकी; तथा पाठ्यक्रम, नीति और क्षमता निर्माण जैसे विषयों पर अकादमिक सत्र आयोजित किए जाएंगे। समापन सत्र में संगोष्ठी की प्रमुख चर्चाओं और निष्कर्षों को प्रस्तुत किया जाएगा।
यह राष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय ज्ञान प्रणालियों और आधुनिक तकनीकी नवाचार के बीच संवाद को प्रोत्साहित करने का मंच प्रदान कर रही है। इसका व्यापक उद्देश्य ऐसे तकनीकी भविष्य की संभावनाओं पर विचार करना है जिसमें नवाचार के साथ मानवीय मूल्य, सामाजिक समावेशन, सांस्कृतिक निरंतरता और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हों।









