
शिमला: स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई), हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई ने विश्वविद्यालय में नियुक्तियों, पदोन्नतियों तथा यूजीसी-सीएएस के तहत दिए गए वित्तीय लाभों में बड़े पैमाने पर हुई कथित अनियमितताओं को लेकर 19 मई को हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को पांच अलग-अलग ज्ञापन सौंपे हैं। एसएफआई ने इन मामलों की उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच, एफआईआर दर्ज करने तथा दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। लेकिन एक महीने से भी अधिक समय होने के बाद भी प्रशासन द्वारा कोई भी उचित कार्यवाही इनके खिलाफ़ नहीं की गई है इसीलिए आज फिर से एस ०एफ ०आई hpu द्वारा विश्विद्यालय के रजिस्ट्रार से फ़ीडबैक और मेमोरेंडम पर उचित कार्यवाही को लेकर उनका घेराव किया
एसएफआई ने आरोप लगाया है कि डिपार्टमेंट ऑफ लाइफ लॉन्ग लर्निंग (DLL) में असिस्टेंट प्रोफेसर (अर्थशास्त्र) की नियुक्ति के लिए यूजीसी नियमों के विपरीत पात्रता शर्तों में बदलाव कर एक विशेष व्यक्ति को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया। संगठन का कहना है कि बिना वैधानिक निकायों की मंजूरी के “पांच वर्ष का शोध अनुभव” अनिवार्य बनाकर भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित किया गया। एसएफआई ने इस पूरे मामले में तत्कालीन रजिस्ट्रार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने तथा विशेष जांच दल (SIT) गठित करने की मांग की है।
दूसरे ज्ञापन में एसएफआई ने इंस्टीट्यूट ऑफ वोकेशनल स्टडीज (IVS) में प्रोफेसर पद पर हुई नियुक्ति पर सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि संबंधित व्यक्ति ने यूजीसी द्वारा निर्धारित न्यूनतम सेवा अवधि पूरी नहीं की थी, फिर भी उसे प्रोफेसर नियुक्त किया गया। एसएफआई ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय ने एक ही प्रकार की सेवा को अलग-अलग मामलों में अलग-अलग तरीके से व्याख्यायित कर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है। इस मामले की स्वतंत्र जांच तथा जांच पूरी होने तक सभी वित्तीय और प्रशासनिक लाभ रोकने की मांग की गई है।
तीसरे ज्ञापन में एसएफआई ने यूजीसी-कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) के तहत हुई नियुक्तियों और पदोन्नतियों में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का आरोप लगाया है। संगठन के अनुसार कई शिक्षकों को नियमों के विपरीत पूर्व प्रभाव से पदोन्नतियां और करोड़ों रुपये के एरियर दिए गए हैं। कुछ मामलों में आवश्यक सेवा अवधि पूरी किए बिना प्रोफेसर पद के लाभ प्रदान किए गए, जबकि गैर-शैक्षणिक पदों को भी कथित रूप से शैक्षणिक पदों के समकक्ष मानकर लाभ दिए गए।
एसएफआई ने कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की टिप्पणियों ने भी विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संगठन का आरोप है कि करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन का दुरुपयोग किया गया है, जबकि दूसरी ओर छात्रों पर लगातार फीस वृद्धि का बोझ डाला जा रहा है।
एसएफआई ने मांग की है कि वर्ष 2010 और 2018 के बाद यूजीसी-सीएएस के तहत हुई सभी नियुक्तियों और पदोन्नतियों की न्यायिक अथवा एसआईटी जांच करवाई जाए, अवैध रूप से प्राप्त वित्तीय लाभों की वसूली की जाए तथा दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए। इसके अलावा विश्वविद्यालय में ERP के नाम पर 20 करोड़ से भी अधिक खर्चा करने के बाद भी छात्रों के परिणामों में को सुधार नहीं किया गया और इन सभी फिज़ूल खर्चों का बोझ छात्रों पर फ़ीस वृद्धि के नाम से लदा जा रहा है जिसके परिणाम विश्विद्यालय द्वारा माई में प्रवेश परीक्षा फॉर्म और प्रवेश परीक्षा करवाई गई फीस वृद्धि के चलते बहुत सारे विभागों फॉर्म को लेकर भारी गिरावट देखने को मिली सोशल वर्क, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन,MA डिफेंस , आर्कियोलोजि,MArd, इन सभी विभागों में बहुत अधिक गिरावट आई है यह सिर्फ अभी शुरुआत है जिस तरह से अतार्किक फ़ीस वृद्धि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा की गई है यह गरीब छात्रों की शिक्षा को रोकने का काम करेगी अतः
परिसर सचिव मुकेश ने चेतावनी दी है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन इन गंभीर मामलों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं करता है तो एसएफआई छात्रों को संगठित कर व्यापक आंदोलन चलाने के लिए बाध्य होगी।










