दिल्ली के व्यस्ततम मार्गो में शुमार बाबा खड़क सिंह मार्ग को उनके ऐतिहासिक योगदान को याद किया जाएगा दिल्ली के पॉश एरिया में यह लंबी-चौड़ी सड़क है। इसके इर्द गिर्द का आकर्षण यहां, परंपरागत चीजों के जरिए समाई राज्यों की विविधता है। और गुरुद्वारा बंगला साहिब व कनॉट प्लेस स्थित हनुमान मंदिर से भी यह सड़क जुड़ती है। यही कारण है, इस मार्ग पर हमेशा वाहनों की आवाजाही रहती है। लेकिन जब मार्ग से लोग गुजरते हैं और बाबा खड़क सिंह मार्ग के साइन बोर्ड को देखते हैं तो गर्व की अनुभूति करते हैं। एक गौरवान्वित इतिहास पर फक्र करते हैं। वही खड़क सिंह जिन्होंने अंग्रेजों के समक्ष हार नहीं मानी। अंग्रेजों के खिलाफ चाबियों वाला मोर्चा खोल दिया, परिणाम स्वरूप अंग्रेजों को घुटने टेकने पड़े। इसे ही, महात्मा गाधी ने भारत की स्वतंत्रता के लिए पहली निर्णायक लड़ाई जीतना कहा था। बाबा खड़क सिंह का जन्म सियालकोट (वर्तमान पाकिस्तान) में 6 जून 1867 में हुआ था। ये विद्यार्थियों के उस पहले समूह में शामिल थे जिन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी लाहौर से स्नातक किया। सन् 1919 में जलियावाला बाग नरसंहार ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। 1921 में गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी एक्ट लागू होने के बाद वे पहले अध्यक्ष बने थे। उन्होंने ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ एक चाबी वाला मोर्चा शुरू किया था। शिरोमणि अकाली दल से जुड़े व जग आसरा गुरु ओट (जागो) के महामंत्री परमिंदर सिंह के मुताबिक यह मोर्चा इतिहास में अमर है। दरअसल, अंग्रेजों ने स्वर्ण मंदिर के तोशाखाना (खजाना) की चाबिया अमृतसर के ब्रिटिश डिप्टी कमिश्नर ने ले ली थीं। बाबा ने चाबिया लौटाने के लिए मोर्चा खोल दिया। खड़क सिंह गिरफ्तार होने वालों में पहले थे। लेकिन आदोलन अनवरत जारी रहा। आखिरकार ब्रितानिया हुकूमत को बाबा की लौह इच्छाशक्ति के सामने झुकना पड़ा। 17 जनवरी 1922 को अकाल तख्त पर एक सार्वजनिक समारोह के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधियों ने चाबिया उन्हें सौंप दीं। उस दिन महात्मा गाधी ने उन्हें तार भेजा कि -भारत की स्वतंत्रता के लिए पहली निर्णायक लड़ाई जीत ली गई है, बधाई। इसके बाद भी वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज बुलंद करने के कारण बार-बार जेल गए। कहा जाता है कि देश की आजादी के बाद वे दिल्ली में आकर बस गए। यहा पर सामाजिक कार्य करने लगे। 1975 में इरविन रोड का नाम बाबा खड़क सिंह के नाम पर रख दिया गया।





