सबकी खबर , पैनी नज़र

October 13, 2026 11:09 pm

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अम्बाला छावनी में ‘‘आजादी की पहली लड़ाई का शहीद’’ स्मारक बनकर तैयार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द करेंगे उद्घाटन- ऊर्जा मंत्री अनिल विज

800 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित स्मारक उद्घाटन के बाद आम जनता के लिए खोला जाएगा’’- अनिल विज

1857 की क्रांति के इतिहास को 23 गैलरियों में किया गया प्रदर्शित, देशभर के 700 से अधिक वीरों के नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित’’- विज

360 डिग्री प्रोजेक्शन, साउंड एवं लेजर शो और 2,500 दर्शकों की क्षमता वाला ओपन एयर थिएटर होंगे प्रमुख आकर्षण’’- विज

चंडीगढ़, 13 अक्टूबर – हरियाणा के ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री श्री अनिल विज ने कहा कि अम्बाला छावनी में 800 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित ‘‘आजादी की पहली लड़ाई का शहीद स्मारक’’ पूरी तरह तैयार हो चुका है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जल्द ही एशिया के इस सबसे बड़े शहीद स्मारक का उद्घाटन करेंगे। उद्घाटन के बाद इसे आम जनता के लिए खोल दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह स्मारक केवल अम्बाला या हरियाणा का नहीं, बल्कि पूरे देश का राष्ट्रीय स्मारक है, जो 1857 की क्रांति के उन वीरों के बलिदान को समर्पित है, जिन्हें इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया।
श्री विज आज चंडीगढ़ में पत्रकार वार्ता को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई में जिस भी व्यक्ति ने अपने घर से एक कदम भी बाहर निकालकर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया, वे उन सभी वीरों को नमन करते हैं। उस समय ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार दुनिया के बड़े हिस्से तक था, लेकिन भारत के किसानों, जवानों, महिलाओं और बच्चों सहित असंख्य देशवासियों ने स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दी। इन सभी के योगदान को सम्मान देना हमारा कर्तव्य है।
1857 की क्रांति के इतिहास को सामने लाने का प्रयास
ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने कहा कि इतिहास की पुस्तकों में अक्सर यह पढ़ाया गया कि देश की आजादी की लड़ाई कांग्रेस ने लड़ी, जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना वर्ष 1885 में ए.ओ. ह्यूम ने की थी। उन्होंने कहा कि इससे 28 वर्ष पहले, वर्ष 1857 में देशभर में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध व्यापक सशस्त्र संघर्ष हुआ था। इसके बावजूद इस संघर्ष में शामिल अनेक वीरों की गाथाएं और उनके बलिदान लंबे समय तक लोगों के सामने नहीं आ सके।
उन्होंने कहा कि उस दौर में अंग्रेजी शासन ने अनेक भारतीय वीरों को पेड़ों से बांधकर गोलियां मारीं, लेकिन उन्हें वह श्रद्धांजलि और सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। इन गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को उचित पहचान दिलाने के उद्देश्य से शहीद स्मारक की स्थापना का विचार सामने आया।
ऊर्जा मंत्री ने बताया कि उन्होंने पिछली सरकारों के कार्यकाल में भी इस स्मारक के निर्माण की मांग उठाई थी। उन्होंने विभिन्न विधानसभा सत्रों में तत्कालीन सरकारों के समक्ष यह विषय रखा। उनके अनुसार, तत्कालीन मुख्यमंत्री  भूपेंद्र  हुड्डा ने एक अवसर पर इस प्रस्ताव पर सहमति भी जताई थी, लेकिन परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
विज ने कहा कि वर्ष 2014 में प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री  मनोहर लाल के समक्ष इस विषय से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत किए और अम्बाला छावनी में शहीद स्मारक स्थापित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि अम्बाला में 1857 के संघर्ष के शुरुआती घटनाक्रम को सामने लाना आवश्यक था, ताकि इस ऐतिहासिक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सके।
ऐतिहासिक दस्तावेजों और शोध के आधार पर तैयार किया गया स्मारक
विज ने बताया कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. के.सी. यादव ने अपने शोध में अम्बाला छावनी में 1857 के संघर्ष के शुरुआती घटनाक्रम का उल्लेख किया था। उन्होंने कहा कि इस विषय पर अन्य स्रोतों से भी जानकारी और ऐतिहासिक दस्तावेज जुटाए गए। स्मारक में अम्बाला, हरियाणा और देश के विभिन्न क्षेत्रों में हुए संघर्षों का इतिहास प्रदर्शित किया गया है। इस विषय पर एक कॉफी टेबल बुक भी तैयार की जा रही है। उन्होंने कहा कि 1857 का संघर्ष व्यापक स्तर पर फैला था। उस समय कमल के फूल और रोटी के माध्यम से संदेश पहुंचाए जाने का उल्लेख मिलता है। स्मारक में इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए देश के विभिन्न क्षेत्रों में हुए घटनाक्रमों को स्थान दिया गया है।
उन्होंने बताया कि स्मारक की ऐतिहासिक सामग्री की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए देश के पांच प्रतिष्ठित इतिहासकारों की एक समिति गठित की गई। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय पुरातत्व संबंधी संस्थानों, लंदन की लाइब्रेरी और लाहौर से भी ऐतिहासिक दस्तावेज मंगवाए गए हैं। इन दस्तावेजों और शोध के आधार पर स्मारक में तथ्यों को प्रदर्शित किया जा रहा है।
उन्होंने 1857 की क्रांति से संबंधित ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताया कि अम्बाला में 10 मई, 1857 को मेरठ में हुए विद्रोह से लगभग नौ घंटे पहले संघर्ष शुरू होने का उल्लेख मिलता है। उन्होंने 60वीं और 5वीं नेटिव इन्फैंट्री के जवानों की गतिविधियों तथा अंग्रेज अधिकारियों के तत्कालीन सरकारी दस्तावेजों में दर्ज विवरणों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1923-24 के गजेटियर सहित विभिन्न अभिलेखों का अध्ययन कर उस समय की घटनाओं, सैनिकों के विद्रोह और अंग्रेजी शासन की कार्रवाई से संबंधित तथ्यों को सामने लाया गया है।
23 गैलरियों में देशभर की क्रांति का इतिहास
उन्होंने बताया कि स्मारक में कुल 23 गैलरियां बनाई गई हैं, जिनमें अम्बाला, हरियाणा, मेरठ, दिल्ली, पंजाब, गुजरात, झांसी और देश के अन्य क्षेत्रों में वर्ष 1857 के संघर्ष को दर्शाया गया है। इन गैलरियों के माध्यम से आगंतुकों को उस दौर की घटनाओं, क्रांतिकारियों के संघर्ष और उनके बलिदान की जानकारी मिलेगी। उन्होंने कहा कि स्मारक में अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग किया गया है। यहां 360 डिग्री प्रोजेक्शन की व्यवस्था है, जिसके माध्यम से आगंतुकों को ऐसा अनुभव कराने का प्रयास किया गया है मानो वे स्वयं क्रांतिकारियों के बीच खड़े हों और उस ऐतिहासिक दौर को करीब से देख रहे हों। साउंड एवं लेजर शो भी आयोजित किए जाएंगे।
स्मारक में श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एक विशेष गैलरी बनाई गई है। यहां आगंतुक हाथ रखकर डिजिटल माध्यम से श्रद्धांजलि दे सकेंगे और उसका रिकॉर्ड भी रखा जाएगा। श्री विज ने कहा कि स्मारक की परिकल्पना इस प्रकार की गई है कि यहां आने वाले लोग 1857 के ऐतिहासिक कालखंड और स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष को महसूस कर सकें। उन्होंने बताया कि शोध के माध्यम से अब तक 700 से अधिक वीरों के नाम, उनके पिता के नाम और गांवों की पहचान की गई है। इन वीरों के नाम स्मारक में स्वर्ण अक्षरों में अंकित किए गए हैं। भविष्य में अन्य वीरों के संबंध में प्रामाणिक जानकारी प्राप्त होने पर उनके नाम भी इसमें जोड़े जाएंगे।
2,500 दर्शकों की क्षमता वाला ओपन एयर थिएटर और आधुनिक सुविधाएं
ऊर्जा मंत्री ने बताया कि स्मारक परिसर में 2,500 लोगों की बैठने की क्षमता वाला ओपन एयर थिएटर बनाया गया है। इसके अलावा, 300 लोगों की क्षमता वाला ऑडिटोरियम भी स्थापित किया गया है। स्मारक को विस्तार से देखने में लगभग छह घंटे लग सकते हैं। उन्होंने बताया कि आगंतुकों की सुविधा के लिए 40-40 लोगों के समूह बनाए जाने की व्यवस्था की गई है। स्मारक में स्थापित देश की सबसे बड़ी लिफ्टों में शामिल लिफ्ट के माध्यम से एक बार में 40 लोग पहली मंजिल से दूसरी मंजिल तक जा सकेंगे और इस दौरान इतिहास तथा क्रांतिकारी वीरों से संबंधित प्रदर्शनों को देख सकेंगे।
विज ने बताया कि स्मारक में 63 मीटर ऊंचा कमल के फूल के आकार की आकृति बनाई गई है, जिसमें दो हाई-स्पीड लिफ्ट लगाई गई हैं। इसके शीर्ष पर स्काई कैफे भी विकसित किया जा रहा है। परिसर में एक हेलीपैड बनाया गया है। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इस स्मारक को देखने के लिए देश-प्रदेश के साथ-साथ विदेशों से भी बड़ी संख्या में लोग आएंगे।
टिकट बुकिंग के लिए मोबाइल ऐप और वेबसाइट
विज ने बताया कि स्मारक में प्रवेश और टिकट संबंधी जानकारी के लिए मोबाइल ऐप विकसित की गई है। आगंतुक ऑनलाइन टिकट बुक कर सकेंगे और स्मारक की वेबसाइट के माध्यम से भी टिकट प्राप्त कर सकेंगे। परिसर में स्मारक से संबंधित स्मृति-चिह्नों और अन्य वस्तुओं की बिक्री के लिए आठ दुकानें बनाई गई हैं, जहां स्मारक की प्रतिकृतियां भी उपलब्ध होंगी। उन्होंने बताया कि स्मारक की विद्युत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अलग सब-स्टेशन स्थापित किया गया है तथा बिजली आपूर्ति के वैकल्पिक प्रबंध के लिए जनरेटर भी लगाया गया है।
सभी राज्यों से स्मारक में राज्य दिवस मनाने का आग्रह
विज ने बताया कि सभी राज्यों को पत्र लिखकर आग्रह किया गया है कि वे अपने वार्षिक राज्य दिवस के कार्यक्रम इस राष्ट्रीय स्मारक में आयोजित करें। उन्होंने कहा कि इससे देश के विभिन्न राज्यों के लोगों को 1857 की क्रांति के इतिहास और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से जुड़ने का अवसर मिलेगा।
ऊर्जा मंत्री ने कहा कि आजादी की पहली लड़ाई के शहीद स्मारक का उद्देश्य उन वीरों को उचित सम्मान देना है, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया और अपने प्राणों का बलिदान दिया। यह स्मारक आने वाली पीढ़ियों को उनके साहस, त्याग और देशभक्ति से परिचित कराने के साथ-साथ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने का अवसर प्रदान करेगा।