सबकी खबर , पैनी नज़र

September 14, 2026 8:43 pm

सबकी खबर, पैनी नज़र

सबकी खबर, पैनी नज़र

September 14, 2026 8:43 pm

केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला में हिंदी पखवाड़ा–2026 का उत्साहपूर्ण शुभारंभ

शिमला:भाकृअनुप–केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला में हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी पखवाड़ा–2026 का शुभारंभ उत्साहपूर्ण वातावरण में हुआ। 14 से 28 सितंबर, 2026 तक आयोजित होने वाले इस पखवाड़े का उद्देश्य राजभाषा हिंदी के प्रति जागरूकता एवं सम्मान की भावना को सुदृढ़ करने के साथ-साथ कार्यालयीन कार्यों में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग को प्रोत्साहित करना है।
कार्यक्रम में निदेशक डॉ. ब्रजेश सिंह, डॉ. आलोक कुमार, प्रधान वैज्ञानिक, , प्रशासनिक अधिकारी तथा मेधावी, सहायक निदेशक (राजभाषा) ने हिंदी के महत्व, उसके व्यावहारिक प्रयोग तथा राजभाषा के प्रति संस्थान की जिम्मेदारी पर अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने अधिकारियों एवं कर्मचारियों को पखवाड़े के दौरान आयोजित विभिन्न गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेने के लिए प्रेरित किया।
निदेशक डॉ. ब्रजेश सिंह ने हिंदी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्ष 1949 में  हिंदी और केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान—दोनों की यात्रा का महत्वपूर्ण आरंभ-बिंदु रहा है। 14 सितंबर 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में संवैधानिक पहचान मिली और इसी वर्ष केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान की स्थापना हुई। उन्होंने कहा कि यह संयोग हिंदी और संस्थान, दोनों के लिए एक विशेष ऐतिहासिक जुड़ाव को दर्शाता है। आज संस्थान में होने वाले अनुसंधान, प्रशासनिक कार्यों और ज्ञान के प्रसार में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देकर इस जुड़ाव को और सार्थक बनाया जा सकता है। उन्होंने अधिकारियों एवं कर्मचारियों से हिंदी को केवल निर्धारित अवसरों तक सीमित न रखते हुए अपने दैनिक कार्यालयीन कार्यों का सहज हिस्सा बनाने का आह्वान किया।
राजभाषा हिंदी के महत्व पर बात करते हुए मेधावी, सहायक निदेशक (राजभाषा) ने कहा कि हिंदी का प्रयोग केवल नियमों के पालन तक सीमित नहीं है। संविधान और राजभाषा संबंधी प्रावधान हमें हिंदी के प्रयोग की दिशा अवश्य दिखाते हैं, लेकिन किसी भाषा की वास्तविक ताकत तब दिखाई देती है, जब वह हमारे रोजमर्रा के काम और व्यवहार का हिस्सा बनती है। उन्होंने कहा कि हम कृषि अनुसंधान से जुड़े संस्थान में कार्य करते हैं, इसलिए हमारी हिंदी केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। हमारे वैज्ञानिकों का शोध, नई तकनीक और कृषि संबंधी ज्ञान जब सरल भाषा में किसानों और समाज तक पहुँचता है, तभी उसका प्रभाव और व्यापक होता है। आज तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में हिंदी के लिए संभावनाएँ और भी बढ़ी हैं। ऐसे में आवश्यकता केवल हिंदी को सम्मान देने की नहीं, बल्कि उसे आत्मविश्वास के साथ अपने काम में उतारने की है।
डॉ. आलोक कुमार, प्रधान वैज्ञानिक-सह-संभागाध्यक्ष तथा श्री रजत सेठी, प्रशासनिक अधिकारी ने भी हिंदी से जुड़ाव को केवल भाषा के प्रति सम्मान तक सीमित न रखते हुए, उसे अपने कार्य और व्यवहार में अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हिंदी आज निरंतर व्यापक हो रही है और देश की सीमाओं से परे भी लोग इसे भारत से जुड़ने और भारतीय समाज को समझने के माध्यम के रूप में अपना रहे हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने BRICS जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी की बढ़ती पहुँच का उल्लेख करते हुए कहा कि जब दूसरे देशों के लोग भारत से जुड़ने के लिए हिंदी को अपना रहे हैं, तो हमें भी हिंदी के प्रयोग को लेकर उतना ही आत्मविश्वास और सक्रियता दिखानी चाहिए। उन्होंने अधिकारियों एवं कर्मचारियों को हिंदी पखवाड़े की विभिन्न गतिविधियों में उत्साहपूर्वक भाग लेने तथा हिंदी के प्रति अपने जुड़ाव को व्यवहारिक रूप देने के लिए प्रेरित किया।
हिंदी पखवाड़े की शुरुआत के साथ ही आज पहली गतिविधि के रूप में आशुभाषण प्रतियोगिता आयोजित की गई। प्रतियोगिता में अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और दिए गए विषयों पर तत्काल अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रतिभागियों की सक्रियता और उत्साह ने पहली ही गतिविधि में हिंदी के प्रति उनकी रुचि और जुड़ाव को स्पष्ट रूप से सामने रखा तथा पखवाड़े की आगामी गतिविधियों के लिए भी एक सकारात्मक वातावरण तैयार किया।
हिंदी पखवाड़ा–2026 के शुभारंभ के साथ संस्थान में हिंदी के प्रति उत्साह और सहभागिता का वातावरण बना, जो आगामी गतिविधियों में भी देखने को मिलेगा।